गणेशोत्सव में सियासी झाँकी…

वैभव बेमेतरिहा।  रायपुर।  सत्ता बदली, तो क्या व्यवस्था नहीं बदली ? क्योंकि हर साल की तरह इस साल भी गणेश झाँकी से पहले राजनीतिक विवाद गरमा गया है. मसला राजधानी में निकाली जाने वाली झाँकी का है. इस धार्मिक आयोजन में राजनीति इस कदर घुस गई है कि पहले जो शिकायत रमन सरकार में कांग्रेस को रहती थी, वहीं शिकायत अब भूपेश सरकार में भाजपा को है.

सत्ता के आगे कहाँ किसकी चलती है. ऊपर लगी इस तस्वीर को देखकर समझ सकते हैं. ये तस्वीर कलेक्ट्रेट की है. कलेक्ट्रेट पहुँचे उन लोगों की जो धार्मिक कम, राजनीतिक ज्यादा लगते हैं. लगेंगे भी क्योंकि जिनके नेतृत्व में ये लोग पहुँचे हैं, वे रमन सरकार में ताकतवर मंत्री रहे हैं. नाम है राजेश मूणत. ये और बात है कि कल तक, जो कलेक्टर इनके चौखट पर आते थे, आज वहीं पूर्व मंत्री जी कलेक्टर की चौखट पर आ पहुँचे हैं धार्मिक आयोजन में जगह नहीं मिलने की अर्जी लेकर. नेता जी का कहना है कि उनकी समिति द्वारा गणेश झांकी का स्वागत करने के लिए जयस्तम्भ चौक के पास पंडाल लगाया जाता है, लेकिन इस बार जयस्तम्भ चौक के पास पंडाल लगाने की अनुमति उनको नही मिली है. उनका आरोप है कि धार्मिक आयोजन का राजनीतिकरण किया जा रहा है.

इधर भाजपा के इन आरोपों पर कांग्रेस ने पलटवार किया है. कांग्रेस के विधायक विकास उपाध्याय का कहना है, कि इसमें जिला प्रशासन परमिशन देता है, जो लोग पहले आवेदन लगाते हैं उन्हें पहले आओ पहले पाओ की स्थिति में अनुमति मिल जाती है. पहले बीजेपी की सरकार थी, तो हमें जगह नहीं मिलती थी.

वाह भई बड़ा गजब हो गया है,  लीजिए धार्मिक आयोजन में भी किसी मार्केट की तरह पहले आओ, पहले पाओ की स्थिति है. लेकिन जो भी हो यह सही नहीं है. धार्मिक आयोजन में पक्ष-विपक्ष, दल-बल की सियासत नहीं होनी चाहिए. बेहतर तो ये होता कि एक ही मंच से भगवान गणेश का कांग्रेस और भाजपा साथ-साथ स्वागत करें. वैसे मौका अभी भी है. क्योंकि झाँकी शनिवार शाम को निकलेगी. ऐसे में सत्ताधारी दल, विपक्ष को भी साथ बुला ले और  थोड़ी जगह खुद रख ले….थोड़ी उन्हें दे.  जहाँ तक सवाल जिला प्रशासन का है, तो वो सत्ता के हिसाब से ही चलता है. वहाँ अर्जी नहीं…सत्ता की मर्जी चलती है.

 

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