• संस्कृति विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों की मांग को लेकर प्रधानमंत्री से की गई शिकायत
  • हड़ताल पर जाने की तैयारी कर रहे अधिकारी-कर्मचारी

आलम यही रहा तो छत्तीसगढ़ के एक सरकारी विभाग में तालेबंदी की नौबत आ जाएगी। यहां काम करने वाले अधिकारी-कर्मचारी अपने दफ्तरों में नहीं बल्कि बाहर निकलकर प्रदर्शन करते नजर आएंगे। मुमकिन है कि ये नजारा जल्द ही देखने को मिल जाए,क्योंकि हालात कुछ ऐसे ही बनते दिख रहे हैं। सुनकर चौंक जाएंगे कि सरकार का ये विभाग वैसे तो राज्य गठन के वक्त से काम कर रहा है, लेकिन विभाग का अपना कुछ भी नहीं। ना नियम हैं और ना ही कायदे। दूसरे विभागों से लाए गए अधिकारियों के भरोसे ये विभाग चल रहा है, जहां है तो मनमानी, गड़बड़ियां और नाइंसाफी। ऐसा नहीं है कि इस विभाग के अपने अधिकारी औऱ कर्मचारी नहीं है। लेकिन इनका होना या ना होना, लगभग बराबर ही है। सूबे में हर स्तर पर आवाज बुलंद की गई, लेकिन सुनवाई नहीं हुई, तो शिकायत का पुलिंदा बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी भेजा गया है। इस उम्मीद के साथ कि इंसाफ परस्त मोदी व्यवस्था बहाली का फरमान भी तो सुना दे। पढ़िए ये रिपोर्ट-

छत्तीसगढ़ सरकार का एक विभाग कितना गैर जिम्मेदार हो सकता है, इसकी एक बानगी आज हम आपको दिखाने जा रहे हैं। सुनहर हैरानी भी होगी और इस बात को लेकर शिकायत भी कि आम आदमी जिस सिस्टम की बदहाली का शिकार हो जाता है, उसी सिस्टम को चलाने वाले आखिर कैसे नियम कायदों की धज्जियां उड़ाने वालों का बचाव करने लगते हैं। मामला राज्य की संस्कृति को बचाने वाले सिपहसलार विभाग संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग का है। दरअसल विवाद विभाग के सेटअप,भर्ती नियम और वेतन विसंगति को लेकर हैं। मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद तय किया गया था कि विभागीय सेटअप और वेतन मध्यप्रदेश के तर्ज पर ही होंगे। विभाग का काम चलता रहा, लेकिन इस बीच विभाग ने अपना खुद का कोई सेटअप तैयार नहीं किया गया। सेटअप बनाए बगैर विभाग ने सीधी भर्ती भी कर ली और बगैर वेतन आय़ोग के सिफारिश के खुद का वेतनमान भी तय कर दिया। मध्यप्रदेश में जो पद नही थे, ऐसे पदों पर भी नियुक्ति कर दी गई।

जरा देखिए एक नजर में विभाग की गड़बड़ियों को?

– संचालनालय संस्कृति एवं पुरातत्व में भर्ती नियम मध्यप्रदेश के हैं, लेकिन उसका अनुसरण नहीं किया गया।
– छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 2000 में स्वीकृत सेटअप में पूर्व में लागू वेतनमान से अधिक वेतनमान स्वीकृत कर दिया गया। इतना ही नहीं 2008 में संचालक द्वारा सीधी भर्ती की गई औऱ उन विभिन्न पदों पर स्वीकृत भर्ती वेतनमान से अधिक वेतनमान आज तक दिया जा रहा है। इससे सरकार ने अब तक करोड़ों रूपए का भुगतान कर दिया गया। यदि सरकार इस मामले की जांच करे, तो ऐसे में विभाग में नियमों को ताक पर रखकर काम कर रहे अधिकारी और कर्मचारियों से वसूली की नौबत आ जाएगी।
– वेतन बढ़ाने का अधिकार वेतन आयोग को हैं, तो ऐसे में किस अधिकार से विभागीय कर्मचारी और अधिकारियों का वेतन बढ़ा दिया गया।
– पांचवे वेतनमान में संस्कृति विभाग के कर्मियों का वेतन एक-एक स्केल डिफरेंस था।
– विभाग में वेतन विसंगति होने के बावजूद ना केवल विभागीय कर्मचारियों और अधिकारियों को छठवां वेतनमान का फायदा मिला, बल्कि एरियर्स का भुगतान भी किया गया।
– सबसे बड़ी बात ये रही कि आखिर कैसे शासन की नजर से इतनी बड़ी गलती छिपी रह गई। आखिर कैसे जिम्मेदारों ने इस गलती को सुधारने की जहमत नहीं उठाई। तत्कालीन संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने वेतन विसंगति को लेकर 21.05.2009 को वित्त विभाग नोटशीट लिखकर मध्यप्रदेश की तर्ज पर वेतनमान देने के निर्देश दिए थे। लेकिन नतीजा सिफर ही रहा।

प्रतिनियुक्ति पर चल रहा है विभाग?

वैसे तो सरकार के विभागों में प्रतिनियुक्ति एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन संस्कृति विभाग इकलौता विभाग होगा जहां इसकी बुनियाद से अब तक इसकी कमान प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारियों के हिस्से ही रही। जरा समझिए-

– संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में सहायक संचालक के दो ही पद स्वीकृत हैं, लेकिन यहां इस पद पर तीन अधिकारी काम कर रहे हैं। हालांकि एक अधिकारी उमेश मिश्रा राजभाषा आयोग में प्रतिनियुक्ति पर हैं। जबकि पूर्णाश्री राऊत और मुक्ति बैस प्रतिनियुक्ति पर इस  विभाग में काम कर रही हैं। विभाग के भीतर चर्चा है कि मुक्ति बैस की प्रतिनियुक्ति कराए जाने के लिए विभाग ने शासन को पत्र लिखा है। पूर्णाश्री राऊत करीब दो साल से प्रतिनियुक्ति पर विभाग में काम कर रही है।

– विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर राकेश अग्रवाल पदोन्नति के पद पर बैठे हैं। ये भी प्रतिनियुक्ति पर संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग भेजे गए थे। जबकि इस पद के लिए विभाग के अपने तीन दावेदार अधिकारी है। राहुल सिंह, जे आर भगत और एसएससी केरकेट्टा। तीनों फिलहाल उप संचालत के तौर पर काम कर रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि विभाग ने अपनी गलती नहीं मानी। 2008 में तत्कालीन संचालक राकेश चतुर्वेदी ने एक आदेश में कहा था कि परामर्शदात्री समिति की बैठक के निर्देशानुसार स्वीकृत सेटअप में वेतन विसंगति हैं। लिहाजा नियमानुसार कर्मचारियों को मध्यप्रदेश के वेतनमान के मुताबिक वेतनमान दिया जाए। संचालक के इस आदेश के बावजूद इस पर अमल नहीं हो पाया। 21 मई 2009 को तत्कालीन संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने वित्त विभाग को लिखे नोटशीट में विसंगतियों को दूरूस्त करने की वकालत की थी, वित्त विभाग ने इस पर विभाग से अभिमत भी मांगा था, लेकिन मामला ठंडे बस्ते में ही रहा। कहा जाता है कि इस पूरे मामले की नोटशीट ही मंत्रालय से गायब कर दी गई। इस मामले में विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से वजह जानने की कोशिश भी की गई।विभाग के सचिव से लेकर वित्त विभाग के अधिकारियों तक लेकिन कोई भी इस मामले में खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। हालांकि विभाग से जुड़े सूत्र बताते हैं कि अधिकारी-कर्मचारियों के विरोध के बाद सेटअप बनाए जाने की दिशा में तेजी से काम शुरू किया गया है। चर्चा ये भी है कि जल्द ही सेटअप को लेकर मंत्रालय के आला अधिकारियों की बैठक भी होगी।