11 साल की ज़ेबा का जज़्बा, समोसे बेच चलाती है, 9 सदस्यों वाला घर

रायपुर. 11 साल की उम्र में यूं तो बच्चों के हाथों में खिलौने होते हैं या किताबें, लेकिन कई बच्चे ऐसे हैं, जो खिलौने और किताबें तो दूर, बाल दिवस का मतलब तक नहीं जानते. बाल दिवस पर हम एक ऐसी बच्ची की कहानी आपके सामने लाये हैं. जिसका जज्बा आपको नई उम्मीद देगा, लेकिन जिसकी ज़िन्दगी की मजबूरी आपकी आंखों में आंसू भी ले आएगी.

ये कहानी है, 11 साल की ज़ेबा की. ज़ेबा सड़कों पर समोसे बेचती है. हर शाम बाज़ार में नन्ही ज़ेबा समोसे की पेटी सर पर उठाए, सड़कों की ख़ाक छानती है. हालांकि किसी बच्चे का समोसा बेचना कोई नई बात नहीं है, लेकिन नई बात ये है कि महज़ 11 साल की उम्र में समोसे बेचते हुए ज़ेबा ना सिर्फ अपनी पढ़ाई का खर्च उठाती है, बल्कि अपने घर का बोझ भी ज़ेबा ही उठा रही है.

ज़ेबा के परिवार में अम्मी और आठ भाई-बहन हैं. अब्बू इतने बड़े परिवार को भगवान भरोसे छोड़कर अलग हो गए. हंसता-खेलता परिवार सड़क पर आ गया. भाई-बहन इतने छोटे थे कि माँ काम पर जा नहीं सकती. ऐसे में पूरी जिम्मेदारी ज़ेबा पर आ गयी. ज़ेबा की उम्र इतनी है कि कोई उसे काम पर रख ले तो उसे बाल मज़दूरी के जुर्म में जेल हो जाए. ज़ेबा ने इसकी तरकीब निकाली और मजदूरी या नौकरी करने की बजाय खुद ही दुकानदार बन गई.

ज़ेबा सुबह उठकर स्कूल जाती है. स्कूल से आते ही समोसे बनाने में जुट जाती है. समोसे बनाकर वो इसे बेचने निकल जाती है. कई बार समोसे नहीं बिकते तो ज़ेबा मैय्यत में मिले खाने से अपना और परिवार का पेट भरती है. इन हालातों में भी ज़ेबा नहीं टूटती वो फिर अगले दिन समोसा बेचने निकल जाती है. कोई और होता तो टूटकर भीख मांगने या अपराध की दुनिया में उतर जाता. लेकिन ज़ेबा के ज़ब्बे ने अपने ज़मीर को ज़िंदा रखा.

ज़ेबा की माँ आंखों में आँसू लिए कहती है, बिल्कुल अच्छा नहीं लगता जब पेट पालने के लिए जिगर के टुकड़े को दर-दर भटकते देखना पड़ता है, लेकिन और कोई चारा नहीं. ठंड शुरु हो गई तो अभी ज़ेबा की सबसे बड़ी ज़रुरत अपने भाई-बहनों के लिए स्वेटर लेना है. क्योंकि पिछली सर्दियों में स्वेटर ना लेने पर 6 महीने का छोटा भाई बीमार पड़ गया था. इलाज के भी पैसे नहीं थे. जब अब्बू के पास मदद के लिए गयी तो अब्बू ने बच्चे को देखने से भी मना कर दिया. भाई की जान बड़ी मुश्किल से बची थी. तभी ज़ेबा ने सोच लिया था कि डॉक्टर ही बनेगी ताकि भाई-बहनों के इलाज के लिए अब्बू के पास ना जाना पड़े.

जैसा हौसला है, लगता है ज़ेबा का सपना जरूर पूरा होगा, लेकिन हालात अक्सर सपने तोड़ देता है. उम्मीद करते हैं, कोई ज़ेबा के इस जज़्बे को देखते हुए मदद का हाथ बढ़ाएगा और उसकी मदद हो पाएगी.

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