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गौरव जैन, गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही। मरवाही वन मंडल में मनरेगा के तहत बनाए गए पुल, पुलिया और स्टॉप डेम निर्माण में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के मामले में छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई की गई, लेकिन उच्च अधिकारी आज भी मलाई छान रहे हैं, जबकि 7 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ, लेकिन बड़े अधिकारी आज भी जस के तस नौकरी कर रहे हैं. कार्रवाई नहीं होने पर अब सवाल उठने लगे हैं.

गौरेला रेंज में वन विभाग के द्वारा मनरेगा के तहत करीब 7 करोड़ रूपये का घोटाला कर मजदूरी और मटेरियल भुगतान में झोलझाल किया था. घटिया निर्माण कराया, जिसकी जांच भी कराई गई. 21 मार्च को विधानसभा में इस आशय का मुददा उठने के बाद कुल 15 लोगों के पर कार्रवाई का आदेश दिया गया था, लेकिन महज कुछ लोगों पर कार्रवाई कर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मनरेगा के तहत इतने बड़े स्तर में हुए भ्रष्टाचार में लिप्त और निलंबन की इस कार्रवाई में तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ गजेंद्र सिंह ठाकुर, जिनका ट्रांसफर वर्तमान में जांजगीर से राजनांदगांव कर दिया गया है.

मरवाही वन मण्डल के रिटायर डीएफओ राकेश मिश्रा के खिलाफ भी कार्रवाई की अनुशंसा की गई थी. कांग्रेस विधायक गुलाब कमरो ने इस संबंध में विधानसभा में सवाल किया था, जिस पर पंचायत मंत्री ने इस मामले में लिप्त सभी कर्मचारियों, अधिकारियों के निलंबन की बात कही थी.

वर्तमान में जिला पंचायत सीईओ गजेंद्र सिंह ठाकुर पर किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं हुई है. वहीं मरवाही वन मंडल के रिटायर्ड डीएफओ से रिकवरी और एफआईआर की कार्रवाई नहीं हुई है. अगले कुछ दिनों में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का जिला दौरा भी प्रस्तावित है. कयास लगाए जा रहे हैं कि इन उच्चाधिकारियों के पर कार्रवाई संभव है.

बहरहाल, प्रदेश के बहुचर्चित सात करोड़ रुपये के मरवाही वनमंडल मनरेगा घोटाला मामले में लिप्त छोटे कर्मचारियों पर तो कार्रवाई हो गई, लेकिन इतने बड़े मामले में अब तक उच्च अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई न होना विधानसभा की अवमानना को दर्शाता है.