नागपुर। चुनाव में मतदान करना हर नागरिक का कर्तव्य है. यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है. परंतु छोटी बातों में आकर नहीं आकर करना है. उकसावे में, भड़काऊ बातों में आकर नहीं करना है. ठंडे दिमाग से सोचिए, कौन अच्छा है, किसने अच्छा काम किया है. सबका अनुभव अब भारत की जनता के पास है. अब इसमें कौन सबसे अच्छा है, उसको मत देना है. यह बात सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर नागपुर मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में कही.

विजयादशमी के अवसर पर हर साल की तरह नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय में कार्यक्रम का आयोजन किया गया. शस्त्र पूजा के बाद स्वयं सेवकों ने पथ संचालन किया. इस दौरान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के साथ सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और प्रमुख अतिथि पद्मश्री शंकर महादेवन उपस्थित थे.

इस दौरान अपने उद्बोधन में डॉ. भागवत ने कहा कि बीते सालों में राष्ट्र की प्रगति और G-20 जैसे आयोजनों का जिक्र करते हुए कहा कि राष्ट्र का पुरुषार्थ, उस-उस राष्ट्र की अपनी धरोहर के आधार पर, अपने वैश्विक प्रयोजन के सिद्ध करने वाले आदर्शों के आधार पर होती है. उनका अनुकरण करते हैं, तब आगे बढ़ते हैं.

डॉ. भागवत ने कहा कि समाज विरोधी कुछ लोग अपने आपको सांस्कृतिक मार्क्सवादी या वोक यानी जगे हुए कहते हैं. परंतु मार्क्स को भी उन्होंने 1920 दशक से ही भुला रखा है. विश्व की सभी सुव्यवस्था, मांगल्य, संस्कार, तथा संयम से उनका विरोध है. मुठ्ठी भर लोगों का नियंत्रण सम्पूर्ण मानवजाति पर हो, इसलिए अराजकता व स्वैराचरण का पुरस्कार, प्रचार व प्रसार करते हैं. माध्यमों तथा अकादमियों को हाथ में लेकर देशों की शिक्षा, संस्कार, राजनीति व सामाजिक वातावरण को भ्रम व भ्रष्टता का शिकार बनाना उनकी कार्यशैली है.

उन्होंने कहा कि ऐसे वातावरण में असत्य, विपर्यस्त तथा अतिरंजित वृत्त के द्वारा भय, भ्रम तथा द्वेष आसानी से फैलता है. आपसी झगड़ों में उलझकर असमंजस व दुर्बलता में फंसा व टूटा हुआ समाज, अनायास ही इन सर्वत्र अपनी ही अधिसत्ता चाहने वाली विध्वंसकारी ताकतों का भक्ष्य बनता है. अपनी परम्परा में इस प्रकार किसी राष्ट्र की जनता में अनास्था, दिग्भ्रम व परस्पर द्वेष उत्पन्न करने वाली कार्यप्रणाली को ‘मंत्र विप्लव’ कहा जाता है.

सरसंघचालक ने कहा कि आज के वातावरण में समाज में कलह फैलाने के चले हुए प्रयासों को देखकर बहुत लोग स्वाभाविक रूप से चिंतित हैं. अपने आपको हिन्दू कहलाने वाले, पूजा के कारण जिन्हें मुसलमान, ईसाई कहा जाता है, ऐसे भी लोग मिलते हैं. उनका मानना है कि फितना, फसाद व कितान को छोड़कर सुलह, सलामती व अमन पर चलना ही श्रेष्ठता है.

इन चर्चाओं में ध्यान रखने की पहली बात यही है कि, संयोग से एक भूमि में एकत्र आए विभिन्न समुदायों के एक होने की बात नहीं है. हम समान पूर्वजों के वंशज, एक मातृभूमि की संतानें, एक संस्कृति के विरासतदार, परस्पर एकता को भूल गए. हमारे उस मूल एकत्व को समझकर उसी के आधार पर हमें फिर जुड़ जाना है.

हमारे देश में विद्यमान सभी भाषा, प्रान्त, पंथ, संप्रदाय, जाति, उपजाति इत्यादि विविधताओं को एक सूत्र में बाँधकर एक राष्ट्र के रूप में खड़ा करने वाले तीन तत्व (मातृभूमि की भक्ति, पूर्वज गौरव, व सबकी समान संस्कृति) हमारी एकता का अक्षुण्ण सूत्र हैं. समाज की स्थाई एकता अपनेपन से निकलती है, स्वार्थ के सौदों से नहीं. हमारा समाज बहुत बड़ा है. बहुत विविधताओं से भरा है.

कालक्रम में कुछ विदेश की आक्रामक परंपराएँ भी हमारे देश में प्रवेश कर गईं, फिर भी हमारा समाज इन्हीं तीन बातों के आधार पर एक समाज बनकर रहा. इसलिए हम जब एकता की चर्चा करते हैं, तब हमें यह ध्यान रखना होगा कि यह एकता किसी लेन-देन के कारण नहीं बनेगी. जबरदस्ती बनाई तो बार-बार बिगड़ेगी.

प्रमुख अतिथि के तौर पर मौजूद गायक शंकर महादेवन ने कहा कि मैं सिर्फ धन्यवाद कर सकता हूं. हमारे अखंड भारत का जो विचार है हमारे कल्चर, हमारे ट्रेडिशन, हमारी संस्कृति बचाकर रखने में इस देश में आप लोगों से ज्यादा किसी और का योगदान नहीं है.