बेंगलुरु: कर्नाटक के बहुचर्चित महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम घोटाले ने एक बार फिर पूर्व मंत्री बी. नागेंद्र की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हाईकमान से मुलाकात के बाद बेंगलुरु लौटे नागेंद्र ने मंत्री पद से इस्तीफा देने की घोषणा की। विपक्षी भाजपा और जेडीएस लंबे समय से घोटाले को लेकर उनके इस्तीफे की मांग कर रहे थे।
एक घोटाला, दो बार गई मंत्री की कुर्सी
बी. नागेंद्र ने इससे पहले 6 जून 2024 को भी मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। उस समय वाल्मीकि निगम में कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आया था। हालांकि, करीब दो साल बाद 3 अगस्त 2026 को उन्होंने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के मंत्रिमंडल में दोबारा मंत्री पद की शपथ ली।
लेकिन विपक्ष के लगातार दबाव और विरोध के बीच नागेंद्र को एक बार फिर पद छोड़ना पड़ा। इस तरह एक ही घोटाले के चलते उन्होंने दूसरी बार मंत्री पद गंवाया है। भाजपा और जेडीएस ने विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान इस मुद्दे पर जोरदार प्रदर्शन किया था और सरकार को घेरने के लिए पदयात्रा का भी ऐलान किया था।
इस्तीफे के बाद नागेंद्र का बड़ा बयान
इस्तीफा देने के बाद बी. नागेंद्र ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि “मनुवादियों ने मुझे निशाना बनाया, क्योंकि वे नहीं चाहते कि कोई आदिवासी व्यक्ति तरक्की करे।” उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा उन्हें ईडी और सीबीआई से नहीं डरा सकती।
क्या है वाल्मीकि निगम घोटाला?
कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम में कथित वित्तीय घोटाला मई 2024 में उस समय सामने आया, जब निगम के लेखा अधीक्षक चंद्रशेखरन पी. ने शिवमोग्गा स्थित अपने आवास पर आत्महत्या कर ली थी।
आरोप है कि निगम को मिले करीब 187 करोड़ रुपये में से लगभग 88 से 89.6 करोड़ रुपये यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की एमजी रोड शाखा से जाली दस्तावेजों और हस्ताक्षरों के जरिए अनधिकृत खातों में ट्रांसफर किए गए। मामला सामने आने के बाद कर्नाटक की राजनीति में भारी विवाद खड़ा हो गया और जांच एजेंसियों की कार्रवाई ने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया।
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