दिल्ली हाईकोर्ट(Delhi Highcourt) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि वैध OCI (ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया) कार्डधारकों के अधिकारों पर मनमाने तरीके से रोक नहीं लगाई जा सकती. यह निर्णय एक अमेरिकी नागरिक जॉन रॉबर्ट रॉटन के निर्वासन और ब्लैकलिस्टिंग के मामले में दिया गया है.
दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश सचिन दत्ता की पीठ ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता जॉन रॉबर्ट रॉटन को कारण बताओ नोटिस जारी किया जाए, और उनकी प्रतिक्रिया पर ध्यान देकर स्पष्ट निर्णय लिया जाए.
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 7डी के अंतर्गत ओसीआई कार्डधारकों के पंजीकरण रद्द करने की प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का अनुपालन अनिवार्य है.
बिना कारण बताए इंडिया में एंट्री पर लगाई रोक
दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जिसमें कहा गया है कि जॉन रॉबर्ट रॉटन, जिन्होंने एक भारतीय नागरिक से विवाह किया, 1991 में ओसीआई कार्ड प्राप्त कर भारत में निवास करने लगे. जून 2024 में अमेरिका की यात्रा के बाद जब वह अक्टूबर में भारत लौटे, तो उन्हें देश में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई. याचिकाकर्ता का आरोप है कि उन्हें निर्वासन का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया और न ही कोई आधिकारिक आदेश जारी किया गया.
दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार के वकील ने तर्क प्रस्तुत किया कि सुरक्षा एजेंसियों ने याचिकाकर्ता को ब्लैकलिस्ट किया, क्योंकि वह नागालैंड और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में बिना अनुमति के धार्मिक गतिविधियों में शामिल थे.
याचिकाकर्ता को पक्ष रखने का मौका मिले
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में कहा कि याचिकाकर्ता को अपनी बात रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए था. अदालत ने यह स्पष्ट किया कि ओसीआई कार्डधारकों को मध्यवर्ती अधिकार प्राप्त होते हैं, और उनके अधिकारों को उचित प्रक्रिया के बिना समाप्त नहीं किया जा सकता. केंद्र सरकार को याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी कर उनकी प्रतिक्रिया पर विचार करना होगा. हालांकि, अदालत ने आरोपों की सत्यता के संबंध में कोई टिप्पणी नहीं की.
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