हरियाणा के करनाल जिले के नीलोखेड़ी निवासी भगत सिंह का शव मौत के करीब सात महीने बाद इटली से उनके पैतृक गांव पहुंचा है, जिससे पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई है।
करनाल। चार साल पहले परिवार ने अपने सपनों की कीमत चुकाई थी। जमीन बेची गई, पैसे जुटाए गए और बेटे भगत सिंह को इस उम्मीद के साथ विदेश भेजा गया कि एक दिन घर की किस्मत बदलेगी। मां को भरोसा था कि बेटा विदेश से लौटेगा तो परिवार के दिन बदल जाएंगे, लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि उसका लौटना इस तरह होगा कि घर में चीखें गूंज उठेंगी।
सात महीने तक परिवार इंतजार करता रहा। हर दिन एक उम्मीद के साथ बीतता कि शायद अब बेटे का शव घर पहुंच जाएगा। मां की आंखें दरवाजे पर टिकी रहीं, पत्नी हर कॉल पर घबरा जाती। लेकिन जब इटली से ताबूत में बंद भगत सिंह का शव करनाल पहुंचा, तो पूरे गांव का माहौल गम में डूब गया। मां और पत्नी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
यह दर्दनाक कहानी हरियाणा के Karnal के नीलोखेड़ी निवासी भगत सिंह की है। परिवार के मुताबिक, करीब चार साल पहले उन्हें बेहतर भविष्य की उम्मीद में पुर्तगाल भेजा गया था। जमीन बेचकर खर्च जुटाया गया था। पुर्तगाल में पीआर (Permanent Residency / स्थायी निवास) मिलने के बाद भगत सिंह बेहतर कमाई और भविष्य की तलाश में इटली चला गया। लेकिन वहां सब कुछ अचानक खत्म हो गया, जब कथित तौर पर उसी के रूममेट ने उसकी बेरहमी से हत्या कर दी।
मौत के बाद परिवार को लगा था कि कुछ दिनों में बेटे का शव भारत पहुंच जाएगा, लेकिन मामला इतना आसान नहीं था। विदेशी जमीन पर हत्या होने के कारण इटली पुलिस की जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, कानूनी मंजूरी और कई सरकारी प्रक्रियाओं ने लंबा वक्त ले लिया। हत्या का आरोप रूममेट पर होने के चलते जांच और भी जटिल हो गई। जब तक स्थानीय प्रशासन और अदालत से मंजूरी नहीं मिली, शव भारत नहीं भेजा जा सका।
इसके अलावा भारतीय दूतावास, स्थानीय प्रशासन और विदेश मंत्रालय के बीच जरूरी दस्तावेज, एनओसी (No Objection Certificate / अनापत्ति प्रमाण पत्र) और अन्य कागजी प्रक्रिया में भी समय लगा। परिवार आर्थिक तंगी से भी जूझ रहा था, क्योंकि विदेश से शव को हवाई मार्ग से भारत लाने का खर्च बेहद ज्यादा था। आखिरकार करीब सात महीने बाद भगत सिंह का शव उनके घर पहुंचा, लेकिन तब तक परिवार के सपने और उम्मीदें दोनों टूट चुकी थीं।

