इजरायल सरकार ने ब्नेई मेनाशे यहूदी समुदाय के लोगों को भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से ले जाना शुरू कर दिया है। मणिपुर और मिजोरम में बसे ब्नेई मेनाशे समुदाय (यहूदी) के करीब 5,800 लोगों की इजराइल वापसी की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है। इजराइली कैबिनेट की ओर से ढाई सौ करोड़ रुपए की योजना को मंजूरी दिए जाने के बाद चरणबद्ध तरीके से समुदाय को इजराइल ले जाया जाएगा। 2026 तक समुदाय के 1,200 लोग इजराइल भेजे जाएंगे। जबकि, 2030 तक पूरी ‘घर वापसी’ का लक्ष्य रखा गया है। पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियों में बसा यह समुदाय खुद को बाइबिल की ‘दस खोई हुई जनजातियों’ में से मेनाशे का वंशज मानता है।

2700 साल पहले आये थे भारत

2700 साल पहले असिरियन निर्वासन के बाद वे पूर्व की ओर बढ़े और अंत में भारत में बस गए। इजराइल सरकार की नई योजना से उनकी ‘घर वापसी’ तेज हो रही है। इसके तहत 2030 तक पूरी कम्युनिटी को इजराइल में बसाया जाएगा। हालांकि इस तेजी के पीछे मणिपुर की जातीय हिंसा की त्रासदी भी छिपी बताई जा रही है।

मणिपुर के चुराचंदपुर, मिजोरम के आइजोल में मुख्य रूप से रिहा​इश भारत में ब्नेई मेनाशे की कुल आबादी कभी 12,000 थी। लेकिन, अब मणिपुर में करीब 4,000 और मिजोरम में करीब 1,800 बचे हैं। इनमें ज्यादातर चुराचंदपुर (मणिपुर) और आइजोल (मिजोरम) में है। ज्यूइश एजेंसी फॉर इजराइल की ओर से इनके स्क्रीनिंग के लिए दिसंबर 2025 में आईजोल में 9 रब्बियों की टीम पहुंची थी।

बेने मेनाशे समुदाय: इजरायल की ‘खोई हुई जनजाति’

बता दें कि, पहले ये लोग ज्यादातर ईसाई थे, फिर औपचारिक रूप से यहूदी मजहब अपनाया। अब ये यहूदी रीति-रिवाज मानते हैं, सुक्कोत जैसे त्योहार मनाते हैं और अपने इलाकों में सिनेगॉग बनाए हैं। 2005 में इजरायल के तत्कालीन सेफार्डी चीफ रब्बी ने इन्हें खोई हुई जनजाति का वंशज मानकर धार्मिक मान्यता दी थी। योजना के अनुसार इजराइल वापसी के बाद ज्यादातर नए लोग गलील में बसाए जाएँगे, जो पहाड़ी इलाका है और नाज़रेथ, टाइबेरियस, साफ़ेद जैसे शहरों के साथ लेबनान बॉर्डर, जॉर्डन घाटी और गलील सागर से जुड़ा हुआ है।

यहाँ सुरक्षा नहीं …

जाने वाले सदस्यों को इजराइल में शांति और सुकून की उम्मीद है। मिजोरम के कम्युनिटी लीडर जेरेमिया एल. ह्नामते कहते हैं, हम ‘प्रॉमिस्ड लैंड’ लौट रहे हैं। मणिपुरा हिंसा ने हमें मजबूर किया, पर यह हमारी जड़ों की पुकार है। एक युवा सदस्य ने कहा, ‘यहां सुरक्षा नहीं, इजराइल में परिवार मिलन, नौकरी, आवास और हिब्रू शिक्षा मिलेगी।’ मणिपुर में मई 2023 में मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जातीय हिंसा शुरू हुई थी। यह 2025 के शुरुआती महीनों तक जारी रही। हिंसा के दौरान कई इलाकों में आगजनी, लूट और हत्याओं की घटनाएं हुईं। हजारों लोग विस्थापित हुए और राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए।

बड़ी वजह: इजराइल की जड़ें और भू-राजनीतिक रणनीति

इजराइल में 1950 के दशक में दुनियाभर में यहूदी जड़ों की खोज शुरू हुई थी। इसके तहत 2005 में इजराइल के मुख्य रब्बी श्लोमो अमर ने यहूदी परंपराओं का पालन करने वाले इस समुदाय को धार्मिक मान्यता दी। इजराइल इसे धार्मिक पुनर्मिलन मानता है। इसके अलावा, उसकी योजना इस समुदाया को गलील क्षेत्र में बसाने की है जिससे उसकी उत्तरी सीमा मजबूत होगी। ऐसे में आस्था, सुरक्षा और रणनीतिक अहमियत की संभावना के कारण ब्नेई मेनाशे को प्राथमिकता दी गई है। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे महत्वपूर्ण जियोनिस्ट फैसला माना है।

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