जल-जंगल-जमीन की लड़ाई में विरोध है, प्रदर्शन है, गुस्सा है, उग्रता है… पर संवेदनशीलता ? मानवता ? शर्म-लाज-लज्जा है ? ये है कि नहीं.. ? भीड़ का भीड़ पर टूटना एक बात है…लेकिन भीड़ का किसी एक पर टूटना, उसे लूटना, नोंचना…लात मारना, चप्पल मारना… कपड़े फाड़ना, लहूलुहान करना…. नीचता है…नीचता.


नीचता से भरे दो वायरल वीडियो ने समूचे छत्तीसगढ़ को शर्मसार कर दिया है. तमनार आंदोलन के बीच से वायरल वीडियो ने आंदोलन की गरिमा को गिराने का काम किया है. आंदोलन को दिशाहीन करने का काम किया है. दोनों ही वीडियो में आंदोलनकारी भीड़ के बीच वर्दीधारी महिलाएं हाथ जोड़कर छोड़ देने की अपील करती हुई नजर आती हैं. लेकिन बेहरम भीड़ दानवों की तरह टूट पड़ती हुई दिखती है.
भीड़ का इस तरह पुलिसकर्मी महिला पर टूटना, सब्र का टूटना नहीं, बल्कि संवेदनशीलता का मर जाना है. मानवता का मर जाना है. उस आंदोलन का मर जाना है, जिसमें जल-जंगल-जमीन को बचाने का उद्देश्य है. लेकिन यह उद्देश्य किसी और उद्देश्य में तब्दील न हो यह आंदोलनकारियों को समझना होगा. समझना होगा कि आंदोलन के रास्ते वे खुद को कहीं किसी और दिशा में तो लेकर नहीं जा रहे है.
महिला टीआई को घेर कर मारना हो या फिर महिला आरक्षक का घसीटकर कपड़े फाड़ना. यह भीड़ की हैवानियत को दर्शाता है. यह आंदोलन को कमजोर कर उसकी क्रुरता को प्रदर्शित करता है. यही नहीं यह सिस्टम की नाकामियाँ, कमजोरियाँ को बताने के साथ बेहतर शासन-प्रशासन के दावे की भी पोल खोलता है.
ऐसे में इन सबके बीच कुछ चाहिए तो वो है भरोसा… उस व्यवस्था पर भरोसा जिसमें न्याय हो. हर अन्याय के खिलाफ न्याय. व्यवस्था को बनाने और संचालित करने वालों को न्याय के सिद्धांत को समझना होगा. ताकि भीड़ को हिंसा से और हिंसक होती भीड़ से लोकतंत्र को बचाया जा सके.
अंत में इतना ही-
अपनों के बीच खुद को न शर्मिंदा रखिए
तमनार बचाइए पर मानवता जिदा रखिए
ये लेखक के अपने विचार हैं.


