पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि गर्भपात कराने का अधिकार पूरी तरह से महिला का होता है। भले ही वह विवाहित हो। अदालत ने एक 21 साल की महिला को उसके पति की सहमति के बिना गर्भपात कराने की इजाजत दे दी।

अदालत ने साफ किया कि इस मामले में महिला की अपनी इच्छा और सहमति ही सबसे ज्यादा मायने रखती है। दरअसल यह फैसला पंजाब की एक विवाहित महिला की याचिका पर आया। महिला ने गर्भावस्था के दूसरे तिमाही में गर्भपात कराने की अनुमति मांगी थी।

क्या है मामला ?

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसकी शादी मई 2025 में हुई थी और पति के साथ उसके रिश्ते ठीक नहीं चल रहे थे। पिछली सुनवाई में अदालत ने स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (पीजीआईएमईआर) को याचिकाकर्ता की जांच के लिए एक मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश जारी किया था। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, महिला चिकित्सकीय रूप से एमटीपी (गर्भावस्था का चिकित्सकीय समापन) कराने के लिए ‘फिट’ थी। 23 दिसंबर की रिपोर्ट के अनुसार, गर्भ में 16 सप्ताह और एक दिन का एक जीवित भ्रूण है, जिसमें किसी प्रकार की जन्मजात विकृति नहीं पाई गई।

मेडिकल रिपोर्ट में क्या ?

मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि मरीज पिछले छह महीनों से अवसाद और चिंता के लक्षणों से ग्रस्त है, और उसका इलाज चल रहा है लेकिन उसमें बहुत कम सुधार हुआ है। तलाक की कार्यवाही के बीच महिला अपनी गर्भावस्था को लेकर बेहद परेशान है। यह सलाह दी जाती है कि वह अपना मानसिक उपचार और परामर्श जारी रखे। वह सहमति देने के लिए मानसिक रूप से स्वस्थ है। जस्टिस सुवीर सहगल की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि रिपोर्ट से स्पष्ट है कि विशेषज्ञों के अनुसार याचिकाकर्ता गर्भपात के लिए चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त स्थिति में है।

कोर्ट ने क्या कहा ?

अदालत ने कहा कि विचार का एकमात्र प्रश्न यह है कि ऐसे गर्भसमापन से पहले अलग रह रहे पति की सहमति आवश्यक है या नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा गर्भसमापन अधिनियम, 1971 में पति की स्पष्ट या निहित सहमति का कोई प्रावधान नहीं है। अदालत ने कहा कि विवाहिता महिला ही सबसे उपयुक्त निर्णयकर्ता होती है कि वह गर्भ को रखना चाहती है या गर्भपात कराना चाहती है। उसकी इच्छा और सहमति ही सबसे महत्वपूर्ण है।