हेमंत शर्मा, इंदौर। देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा लगाए घूम रहे इंदौर में दूषित पानी ने 15 लोगों की जान ले ली। 14 से ज्यादा लोग इलाजरत हैं और 136 मरीज अस्पताल में भर्ती हैं। वहीं 32 लोग ICU में जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं। अब इस त्रासदी के पीछे की असली वजह सामने आ गई है और सीधे कटघरे में खड़े इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव हैं।

निगम को साल 2022 से पता थी गंदे पानी की गंभीर समस्या

Lalluram.com के पास नगर निगम इंदौर की एक गोपनीय आंतरिक नोटशीट एक्सक्लूसिव तौर पर सामने आई है, जिसने निगम और जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। इस नोटशीट में साफ लिखा है कि भागीरथपुरा में गंदे पानी की गंभीर समस्या है और यह बात निगम को साल 2022 से पता थी।

नवंबर 2022 में महापौर के पास भेजी गई थी फाइल

दस्तावेजों के मुताबिक, 2022 में तत्कालीन निगमायुक्त प्रतिभा पाल ने इस समस्या को लेकर नोटशीट तैयार की थी। जुलाई 2022 में टेंडर प्रक्रिया पूरी हुई, और नवंबर 2022 में फाइल महापौर पुष्यमित्र भार्गव और उनकी टीम के पास भेज दी गई। लेकिन इसके बाद जिम्मेदारी की जगह लापरवाही हावी हो गई।

महापौर ने नहीं किया साइन तो नहीं बदला पाईपलाइन

तीन महीने तक महापौर ने फाइल पर साइन नहीं किए, काम ठप पड़ा रहा और भागीरथपुरा में पाइपलाइन नहीं बदली गई। नतीजा यह हुआ कि लोग वही गंदा और जहरीला पानी पीते रहे, जिसकी जानकारी निगम के पास पहले से मौजूद थी।

6 फरवरी 2023 को साइन के बाद भी नहीं हुआ काम

सबसे गंभीर खुलासा यह है कि 6 फरवरी 2023 को फाइल पर महापौर पुष्यमित्र भार्गव के नीले साइन मौजूद हैं, इसके बावजूद आज तक उस इलाके में लाइन बदलने का काम नहीं हुआ। यानी साइन के बाद भी न तो काम हुआ और न ही लोगों की जान की परवाह की गई।

मौन रहे जिम्मेदार

दस्तावेजों से स्पष्ट है कि नगर निगम को 2022 से मालूम था कि गंदा पानी सप्लाई हो रहा है। लेकिन फिर भी फाइलें दबी रहीं और जिम्मेदार मौन रहे। इस लापरवाही की कीमत 15 लोगों ने अपनी जान देकर चुकाई। अब देखना यह होगा कि लापरवाह प्रशासन की वजह से जान गंवाने वालों को न्याय मिलेगा, या एक और मामला छोटी से कार्रवाई के बाद फाइलों में दबकर सिर्फ एक केस बनकर रह जाएगा। 

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