हेमंत शर्मा, इंदौर। शहर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों को लेकर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने विधायकों के घर घेरने का ऐलान किया था, लेकिन हकीकत में यह ऐलान हवा-हवाई साबित हुआ। भाजपा विधायक रमेश मेंदोला के घर घेराव के नाम पर ऐसा सन्नाटा रहा कि प्रदर्शन नहीं, नाश्ते की महफिल बन गई। मेंदोला के निवास पर कांग्रेस की ओर से सिर्फ एक कार्यकर्ता पहंचा। न नारे, न भीड़, न आक्रोश। वह कार्यकर्ता भी विरोध जताने नहीं, बल्कि चाय-नाश्ता कर मुस्कुराते हुए लौट गया।

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बीजेपी-कांग्रेस मिलकर पार्टी मना रहे

खुद कार्यकर्ता ने कबूला कि वह सूचना पर अकेला पहुंचा था, बाद में पता चला कि प्रदर्शन तो पहले ही कैंसल हो चुका है। मौके पर मौजूद भाजपा नेताओं और विधायक के भतीजे ने उसे बैठाया, हालचाल पूछा और नाश्ता करवा दिया। कांग्रेस के इस ‘आंदोलन’ ने संगठन की तैयारी और गंभीरता की पूरी पोल खोल दी। उधर, किसी भी विरोध की आशंका में मेंदोला के घर के बाहर पुलिस ने बैरिकेडिंग कर रखी थी, इधर, कांग्रेस के बड़े नेता मानने लगे कि प्रदर्शन में कमी रह गई, उधर सियासी गलियारों में चर्चा तेज हो गई—“बीजेपी-कांग्रेस मिलकर पार्टी मना रहे हैं।”

न इंसाफ की आवाज उठी, न जवाबदेही तय हुई

दूसरी तरफ, भागीरथपुरा में मृतकों के परिजनों से मिलने पहुंचे कांग्रेस नेताओं को भाजपा कार्यकर्ताओं ने रोका। दोनों ओर से नारेबाजी हुई, लेकिन उसी बीच एक तस्वीर सामने आई जिसने पूरे हंगामे की असलियत दिखा दी। कांग्रेस का विरोध कर रहे भाजपा मंडल अध्यक्ष चंदन सिंह बेस, शहर कांग्रेस अध्यक्ष चिंटू चौकसे के गले मिलते नजर आए। ऐसा लगा मानों विरोध भी पहले से स्क्रिप्टेड हो। आखिरकार पुलिस ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को खदेड़कर लौटा दिया। न इंसाफ की आवाज उठी, न जवाबदेही तय हुई। भागीरथपुरा जैसे गंभीर कांड पर यह पूरा घटनाक्रम साबित करता है कि यह संघर्ष नहीं था, बल्कि राजनीतिक ड्रामा था—जहां जनता की मौत पर भी सियासत ने नाश्ता कर लिया।

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