अभय मिश्रा, मऊगंज। कानून की किताब कहती है कि गवाह निष्पक्ष और स्वतंत्र होना चाहिए, लेकिन मऊगंज जिले के नईगढ़ी और लौर थाने में कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यहां पुलिस के पास ऐसे सुपर गवाह हैं, जो एक ही दिन में 7-7 मुकदमों के चश्मदीद बन जाते हैं। आबकारी से लेकर NDPS तक, हर मामले में वही चेहरा! लल्लूराम डॉट कॉम ने उस सच को बेनकाब किया है जिसे पुलिस फाइलों में दबाया गया था। सरकारी गाड़ी चलाने वाला ड्राइवर ही पुलिस का पॉकेट गवाह निकला। जानें कैसे मऊगंज पुलिस ने इंदौर के खजराना थाने के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है।
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मऊगंज पुलिस की ये कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। यहां अमित कुशवाहा नाम का एक शख्स पुलिस का ऐसा मुरीद है कि वह 500 से अधिक मुकदमों में गवाही दे चुका है। लेकिन कुदरत के नियम इस गवाह पर लागू नहीं होते। साल 2020 की एक FIR 0158/2020 में अमित की उम्र 20 साल दर्ज है, और हैरानी की बात देखिए कि 5 साल बाद, 10/11/2025 की FIR 0501/2025 में उसकी उम्र सिर्फ 21 साल दिखाई गई है। यानी 5 साल के अंतराल में गवाह की उम्र बढ़ी सिर्फ एक साल! खाकी के इस जादू ने कानून के जानकारों को भी सोच में डाल दिया है।
पुलिस ने RTI के जवाब में लिखित दावा किया कि अमित कुशवाहा उनका वाहन चालक नहीं है। लेकिन अमित कुशवाहा को नईगढ़ी थाने की सरकारी गाड़ी चलाते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया। यह वही अमित है जो थाना प्रभारी जगदीश सिंह ठाकुर के साथ साये की तरह रहता है। जहाँ-जहाँ साहब का तबादला होता है, अमित कुशवाहा वहां गवाही देने पहुंच जाता है। जहरीली शराब जैसे संवेदनशील मामलों में जिसमें पूरे जिले का लाइन आर्डर प्रवाहित हुआ था 20 से अधिक लोगों पर एफआईआर दर्ज की गई थी उसमें भी इसे गवाह बनाकर पुलिस ने पूरे सिस्टम को मजाक बना दिया है।
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इस पूरे खेल के केंद्र में हैं नईगढ़ी थाना प्रभारी जगदीश सिंह ठाकुर का नाम सबसे ऊपर रहा है। क्योंकि इनके कार्यकाल में गवाहों का यह सिंडिकेट सबसे ज्यादा फला-फूला है। क्योंकि जगदीश ठाकुर का ट्रैक रिकॉर्ड विवादों से भरा है। बिछिया थाने में राज द्विवेदी की पिटाई पर मानवाधिकार आयोग ने इन पर 1.5 लाख का जुर्माना लगाया था जिसमें सरकारी राजस्व का नुकसान हुआ था। वहीं, अंशु द्विवेदी मामले में मेडिकल रिपोर्ट में मारपीट की पुष्टि होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। आरोप है कि इन्हीं पॉकेट गवाहों के दम पर निर्दोषो को सलाखों के पीछे भेजा जाता है।
पुलिसिया बर्बरता की हद तो तब हो गई जब 80 साल के बुजुर्ग नंदकुमार तिवारी को आधी रात लॉकअप में डाल दिया गया। जुर्म सिर्फ इतना था कि उन्होंने पुलिस की रात में मौजूदगी पर सवाल उठा दिया। एक वायरल ऑडियो ने पुलिस के दावों की पोल खोल दी है, जिसमें पुलिसकर्मी खुद स्वीकार कर रहे हैं कि बुजुर्ग के पास शराब नहीं बल्कि पेट्रोल मिला था, लेकिन केस आबकारी का बना दिया गया। और यहाँ भी गवाह कौन? वही पुलिस का चहेता—अमित कुशवाहा।
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नईगढ़ी ही नहीं, लौर थाने में भी राहुल विश्वकर्मा और दिनेश कुशवाहा जैसे पॉकेट गवाहों की फौज खड़ी है। दिनेश कुशवाहा तो थाने में चपरासी का काम करता है। समाज सेवी कुंजबिहारी तिवारी ने इस संगठित अपराध की शिकायत मुख्यमंत्री, डीजीपी, आईजी और लोकायुक्त से की है। साक्ष्य और वीडियो प्रमाण चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यहाँ न्याय का गला घोंटा जा रहा है।
इस महाघोटाले की जो परतें अभी खुली हैं, वे तो सिर्फ शुरुआत हैं। गवाहों के सिंडिकेट का यह सच पुलिस के CCTNS पोर्टल पर दर्ज डिजिटल रिकॉर्ड से सामने आया है। जानकारों का मानना है कि पुलिस फाइलों में अभी ऐसे सैकड़ों पन्ने दबे हैं जो ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड ही नहीं हुए। अगर उन मैनुअल FIR और पुरानी केस डायरियों की भी निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो पॉकेट गवाहों और फर्जी मुकदमों का यह आंकड़ा कई गुना और बढ़ सकता है, जो नईगढ़ी और लौर थाना पुलिस के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा।
क्या खाकी ही अब बेगुनाहों की जिंदगी से खेल रही है? सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अमानुल्लाह ने हाल ही में ‘पॉकेट गवाहों’ पर सख्त टिप्पणी करते हुए इसे न्याय का कत्ल बताया था। लेकिन मऊगंज के नईगढ़ी थाने ने तो सारी हदें पार कर दी हैं।आरोप है कि थाना प्रभारी जगदीश सिंह ठाकुर ने अपने ही कथित ड्राइवर अमित कुशवाहा को 500 से ज्यादा मुकदमों में गवाह बनाकर एक संगठित सिंडिकेट खड़ा कर लिया है। जहाँ इंदौर में 165 मामलों में 2 गवाहों पर कोर्ट ने नाराजगी जताई थी, वहीं नईगढ़ी का यह ‘सुपर गवाह’ पुलिसिया तंत्र की पोल खोल रहा है। प्रमाणित सबूत मौजूद हैं, सवाल है कि इस फर्जीवाड़े पर एक्शन कब होगा?
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