
बदबूदार फैसला
कभी नहीं सोचा था कि टॉयलेट पर भी लिखना पड़ेगा, मगर क्या करें जंबूरी के आयोजन से ऐसे दस्तावेज बाहर आए हैं, जिसकी वजह से टॉयलेट सुर्खियों में है और इन सुर्खियों पर कलम चलाने की जरूरत आन पड़ी है। जंबूरी में कुल 840 टेम्पररी टॉयलेट और बाथरूम बनाए गए हैं। इसके लिए 1 करोड़ 68 लाख 60 हजार रुपए खर्च किया जा रहा है। इतनी रकम में तो शायद पक्के टॉयलेट और बाथरूम बन जाते। खैर, जंबूरी में बनाए गए टॉयलेट को देखकर यह भी महसूस होता है कि शायद गंदगी की भी अपनी औकात है या शायद वीआईपी की गंदगी का अलग प्रोटोकाल होता है। इसलिए ही तीन अलग-अलग कैटेगरी के टॉयलेट बनाए गए हैं। जनरल, वीआईपी और वीवीआईपी। जनरल कैटेगरी के टॉयलेट की संख्या 400 है और इसकी प्रति यूनिट लागत 22 हजार रुपए बताई जा रही है। इस हिसाब से 88 लाख रुपए खर्च कर जनरल टॉयलेट बनाए गए हैं। इसी तरह 100 मेल और 200 फीमेल बाथरूम बनाए गए हैं। बाथरूम की एक यूनिट पर 18 हजार रुपए खर्च बताया गया है। यानी कुल 300 टेम्पररी बाथरूम बनाने में 54 लाख रुपए खर्च किया जा रहा है। जनरल कैटेगरी के मेल और फीमेल के लिए जंबूरी में अलग से 100 यूरिनल ब्लॉक बनाए गए हैं। यूरिनल ब्लॉक की प्रति यूनिट लागत 13 हजार रुपए है यानी इसकी कुल लागत 13 लाख रुपए आई है। अब जरा नजर वीआईपी और वीवीआईपी टायलेट पर भी डाल लें। वीआईपी कैटेगरी के 30 यूनिट टॉयलेट पर 9 लाख 60 हजार रुपए और वीवीआईपी कैटेगरी के लिए कुल 10 यूनिट टॉयलेट पर 4 लाख रुपए खर्च करने का ब्यौरा सामने आया है। यानी वीआईपी टॉयलेट पर प्रति यूनिट 32 हजार रुपए और वीवीआईपी टॉयलेट पर प्रति यूनिट 40 हजार रुपए खर्च किया जा रहा है। जंबूरी में टॉयलेट और बाथरूम टेम्पररी है, लेकिन व्यवस्था की घृणित आदतें स्थायी है। जंबूरी खत्म हो जाएगा, टॉयलेट हट जाएगा, लेकिन तंत्र का यह बदबूदार फैसला हमेशा रहेगा।
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टेंट वाला
सूबे के एक विभाग में एक टेंट तन गया है। यह कोई साधारण टेंट नहीं है। राजनीतिक गलियारों में यह फुसफुसाहट बड़ी तेज है कि जो इस टेंट से न गुजरे, उसका सरकारी प्रक्रिया में उलझना तय है और जो टेंट से निकल आए, उसकी सभी जटिलताएं अपने आप दूर हो जाती हैं। वैसे तो यह टेंट अस्थायी है, लेकिन इसके नीचे लिए जाने वाले फैसले बड़े टिकाऊ हो गए हैं। दरअसल टेंट वाला विभाग के मंत्री की परछाई है। उसे मंत्री के आर्थिक सौदों का सिपहसालार कहा जाता है। कहने को तो इस विभाग में अफसरों की भारी भरकम फौज है। इन अफसरों ने विभागीय फैसलों पर मुहर लगाने वाली कलम भी पकड़ रखी है, लेकिन इस कलम की स्याही तने हुए टेंट से आ रही है। फिलहाल न तो टेंट उखड़ रहा है और न ही स्याही सूखती दिख रही है। न जाने कब जिल्ले इलाहियों की नजर इस टेंट पर पड़ेगी? खैर, जब यह टेंट उखड़ेगा, तब धूप बड़ी तेज होगी और धूप तेज होगी तब टेंट वाले की परछाई मंत्री से ज्यादा बड़ी दिखेगी। शाश्वत सत्य है कि सत्ता जिसके हाथ में होती है, वह खुद से ज्यादा दिखने वाली हर बड़ी चीज के पर कतर देती है। फ़िलहाल यह कौन जानता है कि बात जब मंत्री के रसूख तक पहुंचेगी तब मंत्री ही अपनी परछाई के पर कतर दें!
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सरकारी चूहे
कवर्धा में 26 हजार क्विंटल धान सरकारी चूहे खा गए। यानी सरकारी चूहों ने करीब 7 करोड़ रुपए का धान गटक लिया। आइए अब जरा इस सरकारी चूहे की क्षमता पर गौर करें। इसे गणित से समझते हैं कि 26 हजार क्विंटल धान के मायने क्या होते हैं? 26 हजार क्विंटल धान की मिलिंग से 16 हजार 900 क्विंटल चावल बनता है। एक आम आदमी का प्रति दिन औसत चावल खपत करीब 400 ग्राम है। यानी इतना चावल एक दिन में करीब 42 लाख 25 हजार लोग खा सकते हैं। एक छोटे राज्य की यह एक दिन की खपत हो सकती है। अगर इतना ही चावल सरकार की मिड-डे मील योजना में भेजा जाए, तो 50 हजार बच्चों को पूरे एक साल तक हर रोज चावल खिलाया जा सकता है। सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की बात करें तो प्रति व्यक्ति 5 किलो प्रतिमाह के हिसाब से 3 लाख 38 हजार लोगों को एक महीने का राशन दिया जा सकता है। इतना ही नहीं सरकारी चूहों ने जितना धान खाया, उतने धान से 26 लाख किलो भूसा निकल सकता है, जिससे हजारों पशुओं को 6 से 8 महीने तक चारा खिलाया जा सकता है। अब जब अगली बार कोई यह पूछे कि चूहे क्या-क्या कुतर सकते हैं? तब यह गणित ज्ञान उनके सामने रख दें। चूहे की काबिलियत सिर्फ कपड़े, जूते, अनाज, दीवार जैसी चीजों को कुतरने भर तक सीमित नहीं रह गई है। सरकारी चूहे सरकारी व्यवस्था को कुतरना बखूबी जानते हैं। यह कोई नई बात भी नहीं है। इस देश के सरकारी चूहों ने बांध तक को कुतर-कुतर कर ढहा दिया है। धान को कुतर कर खा जाने से कोई पहाड़ थोड़े ही टूट गया है।
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कलेक्टरों की शामत
एक जनवरी से कलेक्टर कार्यालयों में भी बायोमेट्रिक अटेंडेंस अनिवार्य हो गया है। बायोमेट्रिक में दर्ज कलेक्टरों के कार्यालय पहुंचने की रिपोर्ट चीफ सेक्रेटरी तक पहुंची। तब पता चला कि तीन जिलों के कलेक्टरों को छोड़कर बाकियों का हाल ढाक के तीन पात की तरह है। कलेक्टरों के कार्यालय में आमद देने का वक्त तय किए गए वक्त से मेल नहीं खा रहा। चीफ सेक्रेटरी का नाराज़ होना स्वाभाविक था। कुछ कलेक्टरों के पास दौरे का बहाना था, मगर सुनते हैं कि चीफ सेक्रेटरी ने दो टूक कह दिया है कि दौरे से पहले कार्यालय आकर बायोमेट्रिक पर अटेंडेंस दर्ज करें फिर दौरे पर जाएं। जब सूबे के आला अफ़सर सुबह-सुबह दौड़ते भागते मंत्रालय पहुंच रहे हों, उस वक्त जिलों से कलेक्टरों की अंगड़ाई भरने की आहट सुनाई देना भला किसे अच्छा लगेगा? बहरहाल सूबे में ठंड पसरा है, भला ऐसे में रज़ाई छोड़कर कौन कलेक्टर उठना चाहेगा? उन्हें लग रहा है कि मानो चीफ सेक्रेटरी स्कूल प्रिंसिपल बन गए हैं और कलेक्टर स्कूल के स्टूडेंट। कलेक्टरों की शामत तो आ ही गई है। नहीं सुधरे, तो चीफ सेक्रेटरी का डंडा चलेगा और डंडे से कराहने की आवाज़ भी आएगी।
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…और पिघल गए मंत्री जी
सूबे के एक मंत्री ने पिछले दिनों अपने ओएसडी और पीए को हटा दिया। यह महज इत्तेफाक ही था कि ओएसडी और पीए दोनों हमनाम थे। जब से मंत्री को कुर्सी मिली थी, तब से साथ बना था। मगर साथ यूं बिखरेगा इसकी कल्पना किसी ने न की थी। ओएसडी और पीए भरोसेमंद थे, लेकिन सुनते हैं कि बेटे की नापसंदगी को मंत्री ने तरजीह दे दी। बेटा मेट्रो शहर में कामकाजी था, लेकिन मंत्री पिता के बढ़ते कामकाज को संभालने बुला लिया गया। राजनीति में जब परिवारिक दखल बढ़ जाए, तब चुनौतियों का पहाड़ उठ खड़ा होता है। राजनीति में भावनाओं की कोई जगह नहीं। मंत्री भावना में पिघल गए थे। सूबे के एक और मंत्री के दफ़्तर में भी व्यापक बदलाव हुआ है। इस बदलाव की पृष्ठभूमि की कहानी भी कुछ यूं ही कही बताई जा रही है।


