Somnath Jyotirlinga Temple: मैं सोमनाथ मंदिर हूं। वो सोमनाथ, जहां भगवान शिव मेरे कण-कण में विरजमान हैं। मेके लिए आज का दिन काफी अहम है क्योंकि आर्यावर्त के भूमि पर मौजूद मुझे 1000 साल पहले आज के दिन ही पहली बार मुस्लिम आक्रांतों ने पहली बार तोड़ा था। शिव शंभू के इस पवित्र स्थल को मुस्लिम लुटेरे ने रक्त रंजित कर और लूटने के बाद मेरे टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे। इसके बाद कई बार मुझे लूटने के बाद तोड़ा गया। 11 मई 1951 को स्वतंत्र भारत में पुनर्निर्मित कर मुझे सजाया और संवारा गया। तो चलिए मैं आपको आज मेरे ध्वस्त होने से बनने तक की कहानियों से रूबरू करवा रहा हूं।
शास्त्रों में 12 ज्योतिर्लिंगों का जिक्र है, लेकिन जब भी इनकी गणना शुरू होती है तो सोमनाथ का नाम सबसे पहले आता ह। “सौराष्ट्रे सोमनाथं च…” सोमनाथ मंदिर को ही भगवान शिव का पहला ज्योतिर्लिंग माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमनाथ का मूल मंदिर स्वयं चंद्रदेव ने सोने से बनवाया था। बाद में इसे सूर्यदेव ने चांदी से बनवाया। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने लकड़ी और आखिर में सोलंकी राजपूत शासकों ने इसे पत्थर से भव्य रूप प्रदान किया।

चंद्रदेव से जुड़ा इकलौता शिव तीर्थ
ऐसी मान्यता है कि चंद्रदेव (सोम) ने भगवान ब्रह्मा के पुत्र राजा दक्ष प्रजापति की 27 बेटियों से विवाह किया था, लेकिन वे सिर्फ रोहिणी से प्रेम करते थे। इससे नाराज़ होकर दक्ष ने उन्हें क्षय रोग (टीबी) का श्राप दे दिया। देवता चंद्रदेव को सोमनाथ लाए। यहां उन्होंने शिव की कठोर तपस्या की। भगवान शिव ने उन्हें आंशिक मुक्ति दी। शिव यहां सोमनाथ यानी सोम (चंद्रमा) के नाथ कहलाए। यही वजह है कि यह मंदिर चंद्र से जुड़ा एकमात्र शिव तीर्थ माना जाता है।

सोमनाथ मंदिर को करीब 17 बार लूटा और तोड़ा गया
सोमनाथ मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है। हजारों सालों में इसे बार-बार मिटाने की कोशिश हुईं, लेकिन ये मंदिर हर बार बिखरकर संवरता गया. मान्यता है कि सोमनाथ मंदिर को करीब 17 बार लूटा और तोड़ा गया। महमूद गजनवी ने भी इस पर कई बार हमले किए। गजनवी सोमनाथ से मंदिर के चंदन द्वार लूटकर गजनी (अफगानिस्तान) ले गया और मस्जिद में लगा दिए।1951 में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के प्रयास से वे द्वार भारत वापस लाए गए और सोमनाथ में स्थापित किए गए।

चालुक्य शैली में बना है मंदिर
जानकारों के अनुसार सोमनाथ मंदिर को चालुक्य शैली में बनाया गया है। इसका निर्माण पीले बलुआ पत्थर से किया गया है. सोमनाथ मंदिर का शिखर करीब 155 फीट ऊंचा है। सोने का कलश और विशाल मंडपम इस मंदिर का आकर्षण और बढ़ा देते हैं।

दिशासूचक स्तंभ बाणस्तंभ मौजूद
मान्यता है कि इस मंदिर परिसर में एक विशेष स्तंभ स्थित है, जिसे बाणस्तंभ कहा जाता है। यह स्तंभ अत्यंत प्राचीन माना जाता है और मंदिर के जीर्णोद्धार के समय इसका भी संरक्षण किया गया। जानकारों की मानें तो यह एक दिशासूचक स्तंभ है, जिस पर समुद्र की दिशा में बना तीर अंकित है। इस स्तंभ पर संस्कृत में लिखा है— “आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत, अबाधित ज्योर्तिमार्ग।

दक्षिण में 6000 किमी तक कोई जमीन नहीं
सोमनाथ मंदिर 20.89° N अक्षांश, 70.40° E देशांतर पर है। मंदिर का शिखर जिस दिशा में है, उसे कहते हैं “निष्कलंक अक्षांश”। सोमनाथ से दक्षिण दिशा में लगभग 6000 किमी तक कोई भूमि नहीं आती। हालांकि, ईस्ट-वेस्ट में छोटे छोटे द्वीप जरूर हैं। मंदिर परिसर के बाणस्तंभ पर संस्कृत (आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिरमार्ग) और दूसरी तरफ इंग्लिश में एक अभिलेख है। इसमें लिखा है- इस बिंदु से साउथ पोल तक सीधी रेखा में कोई अवरोध नहीं है।

समुद्र किनारे, गर्भगृह तक नहीं आती लहरें
सोमनाथ मंदिर अरब सागर के किनारे है, फिर भी सदियों से समुद्र की लहरें गर्भगृह को कभी नहीं छूतीं। मान्यता है कि इसे शिव की कृपा माना जाता है। स्थानीय पंडितों का कहना है कि समुद्र महादेव की मर्यादा में आज भी सीमा नहीं लांघता।
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