सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस उस याचिका पर जारी किया गया है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को कानूनी कार्रवाई से आजीवन छूट देने वाले कानून को चुनौती दी गई है। याचिका पर CJI सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि वह इस कानून की जांच करना चाहती है। जबकि कांग्रेस कार्यकर्ता जया ठाकुर की याचिका में कहा गया कि,
यह प्रावधान मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके कामकाज से जुड़े मामलों में पूरी जिंदगी के लिए नागरिक और आपराधिक कार्रवाई से बचाव देता है। ऐसी सुरक्षा संविधान बनाने वालों ने न्यायाधीशों को भी नहीं दी थी। इसलिए संसद ऐसा संरक्षण नहीं दे सकती, जो संविधान में दूसरे बड़े पदों पर बैठे लोगों को नहीं मिला।
दरअसल, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को लेकर विपक्ष का विरोध है। इनमें एक प्रावधान जोड़ा गया था, जिसके तहत, अगर चुनाव कराते समय या उससे जुड़े किसी फैसले में कोई गलती या विवाद होता है, तो मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों पर निजी तौर पर केस नहीं किया जा सकेगा। यह सुरक्षा उनके पूरे जीवन तक लागू रहेगी, भले ही वे पद पर न हों।
2 मार्च 2023: SC का फैसला- सिलेक्शन पैनल में CJI को शामिल करना जरूरी
CEC और EC की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक पैनल करेगा। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और CJI भी शामिल होंगे। इससे पहले सिर्फ केंद्र सरकार इनका चयन करती थी।
यह पैनल CEC और EC के नामों की सिफारिश राष्ट्रपति से करेगा। इसके बाद राष्ट्रपति मुहर लगाएंगे। तब जाकर उनकी नियुक्ति हो पाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह प्रोसेस तब तक लागू रहेगा, जब तक संसद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कोई कानून नहीं बना लेती।
2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा नया बिल संसद में पास
केंद्र सरकार CEC और EC की नियुक्ति, सेवा, शर्तें और अवधि से जुड़ा नया बिल लेकर आई। इसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तीन सदस्यों का पैनल करेगा। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष का नेता और एक कैबिनेट मंत्री शामिल होंगे। पैनल से CJI को बाहर रखा गया। 21 दिसंबर 2023 को शीतकालीन सत्र के दौरान यह बिल संसद के दोनों सदनों में पास हो गया। विपक्षी दलों का कहना था कि सरकार सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के आदेश के खिलाफ बिल लाकर उसे कमजोर कर रही है। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया।
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