हेमंत शर्मा, इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से अब तक 23 लोगों की जान जा चुकी है। कई परिवार उजड़ गए, दर्जनों लोग अस्पताल पहुंचे, कुछ ICU तक गए। लेकिन इतने बड़े हादसे के बाद भी सिस्टम की चाल लोगों को हैरान कर रही है। ज़हर बन चुका पानी लोगों ने पिया और अब प्रशासन इलाके में मनोचिकित्सक कैंप लगाकर हालात संभालने का दावा कर रहा है।
सोमवार को स्वास्थ्य विभाग ने ‘अभियान स्वास्थ्यवर्धन’ के नाम पर इलाके में सर्वे शुरू किया। 50 दल बनाए गए, जिन्होंने 1657 घरों तक पहुंच बनाई और 4827 लोगों का सर्वे किया। महिलाओं और बच्चों की जांच हुई, बीपी, शुगर और खून की कमी तक देखी गई। कागजों में सब ठीक दिखाने की कोशिश हुई, लेकिन असली सवाल आज भी वही है, पानी ज़हरीला हुआ कैसे?
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. माधव प्रसाद हासानी के मुताबिक सोमवार को भी डायरिया के 12 नए मरीज सामने आए, जिनमें से 3 को रेफर करना पड़ा। यानी खतरा अभी भी खत्म नहीं हुआ। इसके बावजूद लोगों से कहा जा रहा है कि डरने की जरूरत नहीं है। सवाल यह है कि जब लोग मर चुके हैं, तब डर कैसे न लगे?
कलेक्टर के निर्देश पर इलाके में 3 एंबुलेंस तैनात की गई हैं और डॉक्टरों की 24 घंटे ड्यूटी लगाई गई है। मरीजों को एमवाय अस्पताल, अरविंदो अस्पताल और बच्चों को चाचा नेहरू अस्पताल भेजा जा रहा है। निजी अस्पतालों में इलाज कराने वालों को भी मुफ्त इलाज की बात कही जा रही है। लेकिन लोग पूछ रहे हैं कि इलाज से पहले पानी साफ क्यों नहीं किया गया?

सबसे ज्यादा हैरानी इस बात की है कि अब इलाके में मनोचिकित्सकीय काउंसलिंग कैंप लगाया गया है। लोगों को सांस लेने की एक्सरसाइज सिखाई जा रही है और तनाव कम करने के तरीके बताए जा रहे हैं। सवाल सीधा है कि जिन घरों में मौतें हुई हैं, वहां एक्सरसाइज से क्या होगा? लोगों को काउंसलिंग नहीं, साफ पानी और इंसाफ चाहिए।
इलाके के लोगों में गुस्सा साफ नजर आ रहा है। उनका कहना है कि प्रशासन असली मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश कर रहा है। लोग जानना चाहते हैं कि ज़हरीला पानी किसकी गलती से सप्लाई हुआ, जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही और 23 मौतों की जिम्मेदारी कौन लेगा।
स्वास्थ्य विभाग कह रहा है कि हालात अब काबू में हैं और मरीज ठीक होकर घर जा रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि अभी भी 39 लोग अस्पतालों में भर्ती हैं, जिनमें 10 ICU में हैं। ये आंकड़े खुद बताते हैं कि सब कुछ ठीक होने का दावा कितना खोखला है।
भागीरथपुरा का मामला अब सिर्फ बीमारी का नहीं, सिस्टम की नाकामी का बन गया है। लोगों की जान चली गई और जवाब के बजाय सर्वे और कैंप दिए जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या दूषित पानी पीने से लोग दिमागी मरीज हो गए हैं जो मनोचिकित्स्कीय कैंप लगाया जा रहा है। अब देखना यह होगा कि 23 मौतों के बाद भी कोई जिम्मेदार ठहराया जाएगा या मामला यूं ही ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
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