Supreme Court Gave Verdict Example of Manusmriti: जिस ‘मनुस्मृति’ पर आरोपों की झरी लगाकर राहुल गांधी अपनी दलित पॉलिटिक्स करते हैं और बीजेपी-संघ पर हमला करकते हैं। उसी ‘मनुस्मृति’ का उदाहरण देकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। देश के शीर्ष न्यायालय ने फैसले में मनुस्मृति का हवाला देते हुए कहा कि कोई मां, कोई पिता, कोई पत्नी और कोई बेटा छोड़ने लायक नहीं है और जो भी शख्त उन्हें छोड़ता है, उस पर जुर्माना लगना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि एक बहू जो अपने ससुर की मृत्यु के बाद विधवा हो जाती है, वह हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (Hindu Adoptions and Maintenance Act, 1956) के तहत उनकी संपत्ति से भरण-पोषण का दावा करने की हकदार है।

जस्टिस पंकज मिथल और एस वी एन भट्टी की बेंच ने कहा कि कानून की धारा 22 आश्रितों के भरण-पोषण का प्रावधान करती है। यह धारा मृतक हिंदू के सभी वारिसों पर मृतक के आश्रितों का भरण-पोषण करने का दायित्व डालती है, जो उन्हें मृतक से विरासत में मिली संपत्ति से करना होता है और इसमें वह बहू भी शामिल है जो विधवा हो जाती है।

भ्रम की स्थिति इसलिए बनी क्योंकि यह तर्क दिया जाता रहा कि एक बहू, जो ससुर के जीवित रहते विधवा हो गई थी, वह भरण-पोषण की हकदार थी, लेकिन उस मामले में नहीं जब वह उनकी मौत के बाद विधवा हुई। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विधवा बहुओं के बीच पति की मृत्यु के समय के आधार पर किया गया वर्गीकरण गलत और पूरी तरह से मनमाना है और दोनों ही मामलों में वह भरण-पोषण की हकदार है। आगे कहा गया कि यह प्रावधान “आश्रितों के भरण-पोषण” की बात करता है, जिसमें “विधवा बहू” भी शामिल है, जो उसके ससुर की संपत्ति से होता है।

विधवा बहू के भरण पोषण से वंचित करना गलत

देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपने फैसले में कहा कि एक बेटा या कानूनी वारिस विरासत में मिली संपत्ति से सभी आश्रित व्यक्तियों का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य होता हैं, यानी वे सभी व्यक्ति जिनका भरण-पोषण करने के लिए मृतक कानूनी और नैतिक रूप से बाध्य था। इसलिए, बेटे की मौत हो जाने पर, ससुर का यह दायित्व बनता है कि वह विधवा बहू का भरण-पोषण करे, यदि वह खुद या मृतक बेटे द्वारा छोड़ी गई संपत्ति से अपना भरण-पोषण करने में समर्थ नहीं हो पा रही है। कोर्ट ने कहा कि अधिनियम ससुर के अपनी विधवा बहू का भरण-पोषण करने के उपरोक्त दायित्व को खत्म करने की कल्पना नहीं करता है, भले ही वह विधवा कब हुई हो, उनकी मौत से पहले या बाद में। कोर्ट ने कहा. “एक विधवा बहू को भरण-पोषण से वंचित करना, कानून की संकीर्ण या तकनीकी व्याख्या के आधार पर उसे गरीबी और सामाजिक अलगाव की ओर धकेल देगा।

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