रायपुर। तम बिनु होइ न ज्ञान प्रकाशा। मिटइ न मोह बिना परितासा॥ अर्थात् अज्ञानता और मोह का अंधकार तब तक नहीं मिटता जब तक विवेक और प्रकाश का सूरज उदित ना हो। रामचरित मानस की यह चौपाई मकर संक्रांति के “तमसो मा ज्योतिर्गमय” के भाव का प्रतिनिधित्व करती है। मकर संक्रांति में सूर्य का उत्तरायण मनुष्य को आशा, ऊर्जा और समता का संदेश देता है। विश्व में समता का कोई सबसे सशक्त और शाश्वत प्रतीक है तो वह सूर्य है। बिना किसी भेदभाव के बिना किसी पक्षपात के सूर्य सम भाव से अपनी ऊर्जा सम्पूर्ण सृष्टि को प्रदान करता है। न कोई जाति, न कोई वर्ग, न कोई राष्ट्र, सूर्य सबके लिए समान है। भारतीय सनातन परंपरा में सूर्य को केवल एक खगोलीय पिंड नहीं बल्कि जीवन का देवता माना गया है। सूर्य की उपासना, प्रकृति का संतुलन और जीवन दर्शन का महापर्व है—मकर संक्रांति।

मकर संक्रांति वह पवित्र क्षण होता है जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, इसी क्षण से होती है उत्तरायण की यात्रा आरंभ और होता है खरमास का समापन। उल्लेखनीय है कि भारतीय पंचांग की अधिकांश तिथियाँ चन्द्रमा की गति पर आधारित होती हैं लेकिन मकर संक्रांति पूर्णतः सूर्य की गति पर आधारित पर्व है जो इस बात का संकेत है कि इस पर्व की वैज्ञानिक महत्ता भी बहुत ज़्यादा है।

वैज्ञानिक दृष्टि से जैसा कि सभी जानते हैं कि पृथ्वी की धुरी लगभग 23.5 अंश झुकी हुई है और इसी झुकाव की वजह से पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में मौसम बदलते हैं। उत्तरायण में सूर्य दक्षिणी गोलार्ध से हटकर उत्तरी गोलार्ध की ओर अग्रसर होता है इसका सीधा प्रभाव यह होता है कि दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं,सूर्य की किरणें सीधी और ऊर्जावान होने लगती हैं, ठंड का प्रभाव कम होने लगता है और प्रकृति में नवजीवन का संचार होने लगता है।

हमारा देश भारत, उत्तरी गोलार्ध में है यही कारण है कि भारत में उत्तरायण का विशेष महत्व है और ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ जैसे वैदिक मंत्र भारतीय चेतना का मूल बना है।

मकर संक्रांति का पर्व वस्तुतः किसानों के परिश्रम, प्रकृति की कृपा और सूर्य की अनुकम्पा का उत्सव है।कृषि प्रधान देश भारत में इसे अन्नदाता के श्रम का उत्सव भी कहा जा सकता है क्योंकि मकर संक्रांति के आसपास ही भारत के अधिकांश क्षेत्रों में खरीफ फसलों की कटाई पूरी होती है। यही कारण है कि भारत के विभिन्न राज्यों में यह पर्व अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में मकर संक्रांति, गुजरात-महाराष्ट्र में उत्तरायण,तमिलनाडु में पोंगल,असम में माघ बिहू वग़ैरह। अलग-अलग क्षेत्रों में इस त्योहार का नाम भले ही अलग हों लेकिन भाव सबके एक ही है और वो है कृतज्ञता, दान और संतुलन।

सनातन ग्रंथों में उत्तरायण की महिमा मुक्तकंठ से गाई गई है इस अत्यंत पुण्यकारी काल को भगवद्गीता में देवताओं का दिन कहा गया है जबकि दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कही गयी है। सनातन में ऐसा माना जाता है कि उत्तरायण में देह त्याग करने वाले जातक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाभारत में हमें इसी भाव का अद्भुत उदाहरण मिलता है जहाँ भीष्म पितामह ने इच्छामृत्यु का वरदान होते हुए भी देह त्याग के लिए सूर्य के उत्तरायण की प्रतीक्षा की और मकर संक्रांति को प्राण त्यागा।

गंगा अवतरण से भी जुड़ा हुआ है मकर संक्रांति का पर्व।कहते है कि इसी दिन माँ गंगा, राजा भागीरथ के तप से प्रसन्न होकर सागर से मिलीं थी। इसीलिए मकर संक्रांति के दिन गंगासागर और प्रयागराज में महास्नान का विशेष महत्व है।

कहा जाता है इस दिन किया गया दान सौ गुना फल देने वाला होता है। इस दिन तिल, गुड़, वस्त्र, अन्न और जल का दान समाज में समरसता और करुणा को बढ़ाता है। तिल और खिचड़ी के पीछे का छिपा विज्ञान भी मकर संक्रांति मनाने वालों को स्पष्ट होना चाहिए। सर्दी के मौसम में शरीर को ऊष्मा और ऊर्जा प्रदान करने वाले तिल से स्नान, तेल मालिश, हवन और भोजन शरीर और मन दोनों के लिए लाभकारी हैं। इस दिन खिचड़ी का सेवन भी वैज्ञानिक दृष्टि से श्रेष्ठ है क्यों कि चावल-दाल से बनी खिचड़ी पाचन को दुरुस्त रखती है जबकि अदरक और सब्ज़ियाँ शरीर में रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती हैं।

सर्दी के मौसम में सुबह सूर्य की किरणें विटामिन-D प्रदान करती हैं जो हड्डियों और त्वचा के लिए लाभकारी होती हैं और मानसिक प्रसन्नता को बढ़ाने वाली होती हैं। इस तथ्य के आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने की परंपरा केवल मनोरंजन नहीं है बल्कि यह लोगों को सुबह के सूर्यप्रकाश में समय बिताने का अवसर देने का एक माध्यम भी है।

जिस प्रकार भगवान श्री राम ने अपने जीवन में सभी को समान दृष्टि से देखा फिर वो राजा हो या प्रजा, वनवासी हो या ऋषि ठीक वैसे ही सूर्य सबको समान ऊर्जा देकर संदेश देता है कि समता, करुणा और कर्तव्य ही सच्चा धर्म होता है।

मकर संक्रांति का पर्व कई मायनों में मनुष्य के लिए जीवन को सही दिशा में मोड़ने का अवसर भी है। अंधकार से प्रकाश की ओर, जड़ता से गति की ओर और स्वार्थ से सेवा की ओर बढ़ने का संदेश है मकर संक्रांति क्योंकि उत्तरायण का सूर्य केवल दिशा ही नहीं बदलता बल्कि वह मानव चेतना को भी जागृत करता है।

संदीप अखिल,
सलाहकार संपादक,
न्यूज़ 24 एमपीसीजी / लल्लूराम डॉट कॉम