सत्या राजपूत, रायपुर। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर में शिक्षकों की कथित नियमविरुद्ध नियुक्तियों के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट सोमवार को अहम आदेश जारी किया है। इस याचिका को डॉ. शिवकृपा मिश्रा ने दायर किया था, जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालय में नियुक्त पंकजनयन पाण्डेय (एसोसिएट प्रोफेसर, पत्रकारिता विभाग) और राजेंद्र मोहंती (असिस्टेंट प्रोफेसर, जनसंचार विभाग) की नियुक्तियों को नियमों के खिलाफ बताते हुए चुनौती दी थी।

याचिकाकर्ता डॉ. मिश्रा ने हाईकोर्ट को बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन के पास उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए लंबित अभ्यावेदन महीनों से लंबित हैं और अब तक किसी भी प्रकार का निर्णय नहीं लिया गया। इसे प्रशासनिक उदासीनता मानते हुए उन्होंने हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की।
हाईकोर्ट का आदेश और निर्देश
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति और प्रशासन को निर्देशित किया है कि वे डॉ. शिवकृपा मिश्रा के सभी लंबित अभ्यावेदन पर दो माह के भीतर कानून के अनुरूप निर्णय लें। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह शिकायतों पर गंभीरता से विचार करे और इससे बच नहीं सकता। इस आदेश से याचिकाकर्ता को कानूनी और नैतिक रूप से राहत मिली है।
डॉ. शिवकृपा मिश्रा ने हाईकोर्ट के आदेश को नैतिक और कानूनी जीत बताया और कहा कि अब विश्वविद्यालय में की गई कथित अनियमित नियुक्तियों पर निष्पक्ष, पारदर्शी और विधिसम्मत निर्णय की उम्मीद जगी है।
डॉ. शिवकृपा मिश्रा ने यह भी बताया कि छत्तीसगढ़ उच्च शिक्षा विभाग के निर्देश पर गठित जांच समिति की अनुशंसा के बाद विश्वविद्यालय में अयोग्य पाए गए शिक्षकों को हटाने और योग्य अभ्यर्थियों की नियुक्ति के निर्देश पहले ही जारी किए जा चुके हैं। इसी क्रम में जनसंचार विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शहीद अली को बर्खास्त कर उनके स्थान पर डॉ. प्रमोद जेना की नियुक्ति की गई है।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि पंकजनयन पाण्डेय यूजीसी द्वारा निर्धारित न्यूनतम अहर्ताओं को पूरा नहीं करते और वे केवल एम.ए. उत्तीर्ण हैं। इसके बावजूद उन्हें योग्य एवं मेरिटधारी अभ्यर्थियों को दरकिनार कर एसोसिएट प्रोफेसर पद पर नियुक्त किया गया। यह देश में नियुक्ति अदभुत मामला है कि बिना नेट/सेट और पीएचडी के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में सीधे एसोसिएट प्रोफेसर बना दिया जाता है।
याचिकाकर्ता डॉ. शिवकृपा मिश्रा ने बड़े दुख के साथ याचिका में बताया है कि जिस विषय के तहत पत्रकारिता विश्वविद्यालय संचालित होता है, विभाग में 40 सीटें स्वीकृत हैं, वहां इस अयोग्य शिक्षक की अयोग्यता के चलते वर्षों से केवल 4–5 विद्यार्थी ही प्रवेश ले रहे हैं। यह भी उल्लेख किया गया है कि पंकजनयन पाण्डेय की नियुक्ति को विश्वविद्यालय की कार्य परिषद द्वारा बर्खास्त करने का आदेश पारित किया जा चुका है, इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा उन्हें प्रतिमाह लाखों रुपये वेतन का भुगतान किया जा रहा है।
वहीं दूसरी ओर राजेंद्र मोहंती की नियुक्ति पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिका के अनुसार वे मेरिट सूची में शामिल नहीं थे। उन्हें साक्षात्कार में 20 में से 19.50 अंक प्राप्त हुए, इसके बावजूद वे चौथे स्थान पर रहे। आरोप है कि उन्हें लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से मेरिटधारी अभ्यर्थियों को नियुक्ति संबंधी सूचना नहीं दी गई। डॉ. मिश्रा का कहना है कि इस तरह की नियुक्तियों ने पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता शिक्षा व्यवस्था को नुकसान पहुँचाया है।
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