Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor, Contact No : 9425525128

संस्थागत संस्कार

दुर्ग नगर निगम के कमिश्नर साहब ने कोई अपराध नहीं किया। क्या हो गया? अगर उन्होंने अपने मातहत कर्मचारी से मूवी टिकट मंगा ली। फल-सब्जी मंगा लिया। डीटीएच रिचार्ज करा लिया। राशन पानी की व्यवस्था करा ली। यह उनकी व्यक्तिगत अनैतिकता तो है नहीं, यह उनका संस्थागत संस्कार है। यह वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक परंपरा है। खैर, जब यह खबर आई, तो लोग चौंक गए मानो पहली बार यह सब पता चला हो। लोगों को यह मालूम होना चाहिए कि सरकारी व्यवस्था में साहब बनने का मतलब सिर्फ जिम्मेदारियां लेना भर नहीं है, बल्कि विशेषाधिकार अर्जित करना भी है। साहबों का यही तो असली विशेषाधिकार है कि उनकी जिंदगी उनके मातहतों के कंधों पर टिकी हो। मातहत कर्मचारी साहबों की निजी जरूरतों को पूरा करने वाला एक ईंधन है, जो लगातार जलता-खपता रहता है और भ्रष्ट व्यवस्था का पैरोकार बन जाता है। अब वह अपनी जेब से साहब की निजी जरूरत तो पूरा करेगा नहीं, सो उसकी नजर भी दूसरों पर जा टिकती है। यही क्रम निरंतर चलता रहता है। सबसे भयावह यह नहीं है कि यह सब होता है। सबसे भयावह यह है कि इसे सामान्य मान लिया गया है। इसे गलत कहने की जरूरत ही महसूस नहीं होती। कमिश्नर साहब पर उंगली उठाना आसान है, लेकिन इससे ज्यादा कठिन यह स्वीकार करना है कि हर सरकारी दफ्तर, हर विभाग, हर जिले में इसी मानसिकता के छोटे-छोटे संस्करण बैठे हैं। दुर्ग नगर निगम कमिश्नर के मामले को अगर सिर्फ इतना समझ लिया जाए कि इससे सिर्फ एक अफसर बदनाम हुआ और व्यवस्था बेदाग बच गई, तो समझिए यह सरकारी तंत्र की सामूहिक विफलता है। 

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सेवा सुविधा

कुछ बरस पहले सूबे में एक चर्चित घोटाले की डायरी के पन्ने सुर्खियां बन गए थे। काली-नीली स्याही से डायरी में उकेरे गए शब्दों ने सबसे पहले सूबे में यह सार्वजनिक खुलासा किया था कि सरकारी तंत्र के जरिए राजनीतिक और प्रशासनिक चेहरों की निजी जरूरतें कैसे पूरी होती हैं? फल मंगाना, डीटीएच रिचार्ज करा लेना, मूवी की टिकट बुला लेना और राशन-पानी का खर्चा मातहतों के कंधों पर डाल देना यह सब बहुत छोटे-छोटे काम हैं। डायरी के पन्नों में उससे कहीं ज्यादा दर्ज था। इसी राज्य में एक रेंजर ने महिला डीएफओ के लिए बकरा-चिकन से लेकर उनका मसाज कराने तक का खर्चा उठाने की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति की थी। कोविड काल के दौरान एक बार एक विभाग के मध्यम दर्जे के एक अफसर टकरा गए थे। उनकी गाड़ी में राशन, फल-सब्जी का ढेर लगा था। मैंने पूछ लिया- इतना सामान किसके लिए ले जा रहे हैं? उन्होंने हंसते हुए कहा कि साहब के घर छोड़ने जा रहा हूं। ये मेरी हर महीने की जिम्मेदारी है। साहब ने मेरे कंधे पर लाद रखी है। मध्यम दर्जे के अफसर ने वर्दी पहन रखी थी और कंधे पर स्टार चमक रहे थे। हाल ही में जब एक घोटाले के मामले में जांच तेज हुई तब यह मालूम चला कि विभाग के दोषी अधिकारी के पक्ष में जांच रिपोर्ट बनाने वाले एक अधिकारी को एक बड़ी सोसाइटी में महंगी जमीन खरीदकर तोहफे में दे दी गई। दोषी अधिकारी जब पूरी तरह से घिर गए। तब यह देखकर जांच रिपोर्ट बनाने वाले अधिकारी भी घबरा गए। उन्होंने रिपोर्ट उलट दी और जमीन गटक लिया सो अलग। खैर, ऐसा नहीं है कि सिर्फ सरकारी मुलाजिमों पर ही साहबों की जागीरदारी चलती हो। विभागों में काम करने वाले ठेकेदार साहबों के असली व्यवस्थापक हैं। ठेकेदारों के हिस्से कई बड़े काम हैं। साहबों के बंगलों के साजो सामान से लेकर महंगे टूर पैकेज, फ्लाइट टिकट सब कुछ इसमें शामिल है। सरकारी गलियारों में इस व्यवस्था को सेवा-सुविधा कहते हैं, जिससे शोषण सामान्य लगे। रोजमर्रा के काम में होने वाला भ्रष्टाचार इस व्यवस्था से अलग एक हिस्सा है, जिसका कोई ओर छोर नहीं। 

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वह कौन है? 

शराब घोटाला मामले में जांच एजेंसी ने एक अधिकारी की संदेहास्पद भूमिका पर बहुत देर से मुहर लगाई है। जांच एजेंसी ने अपनी हालिया चार्जशीट में इस अधिकारी को आरोपी बनाते हुए उसका नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज कर लिया है। इस विभाग के दर्जनों अधिकारी पहले से आरोपी बनाए हैं और फिलहाल निलंबित हैं। जांच एजेंसी ने निलंबित अधिकारियों की संपत्ति भी जब्त की है। निलंबित अधिकारियों ने जब चार्जशीट में दर्ज नए नवेले नाम को देखा तो मायूस हो गए। उनकी मायूसी की वजह यह नहीं है कि अधिकारी का नाम चार्जशीट में कैसे आ गया? दरअसल मायूसी की वजह यह है कि अधिकारी को अब तक निलंबित क्यों नहीं किया गया। मायूस अधिकारी कहते हैं कि एक पुरानी कहावत है कि अंधा बांटे रेवड़ी, अपने अपनों को दे। विभाग के दर्जनों अधिकारियों को जो रेवड़ी नहीं मिली, वह रेवड़ी आखिर इस अधिकारी को कैसे मिल गई? आखिर वह कौन है जो चार्जशीट में नाम दर्ज होने के बाद भी इस अधिकारी को अपना ‘आशीष’ दे रहा है। 

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दो घूंट

चीफ सेक्रेटरी की भौंहे अब कमिश्नरों को लेकर तन गई हैं। जब मंत्रालय के सचिवों से लेकर जिलों के कलेक्टर तक तय वक्त पर दफ्तर में अपनी आमद दे रहे हो, तब कमिश्नरों में वह कौन से सुर्खाब के पर लग गए हैं, जो खुलेआम आदेश की नाफरमानी कर रहे हैं। बायोमेट्रिक रिकार्ड्स संभाग कमिश्नरों के अनुशासन का डिजिटल सर्टिफिकेट बनकर चीफ सेक्रेटरी की टेबल पर पहुंचा है। समय रहते कमिश्नर चेत जाए तो बेहतर है, नहीं तो चीफ सेक्रेटरी के मिजाज में सख्ती इतनी है कि इस वक्त बायोमेट्रिक भी डर के मारे कंपकंपा रहा है। खैर, अफसरों में बायोमेट्रिक के टेरर की चर्चा पिछले दिनों कलेक्टर्स कॉन्फ्रेंस में भी रही। सुनते हैं कि कुछ कलेक्टरों ने बायोमेट्रिक अटेंडेंस में थोड़ी सहूलियत की गुंजाइश ढूंढने की कोशिश की। जाहिर है यह हिम्मत का काम था, लेकिन हिम्मत के लिए दो घूंट की दरकार थी। जैसे ही दो घूंट गले के नीचे उतर गया तब कुछ ने हिम्मत कर अपनी दलील देनी शुरू कर दी। दलील यह थी कि फील्ड पोस्टिंग में दौरे बहुत होते हैं। कई-कई बार दफ्तर पहुंचने में थोड़ी देरी हो जाती है। उनके यह कहते ही उन्हें दो टूक जवाब मिल गया, पहले दफ्तर आइए। बायोमेट्रिक को बताइए कि आप आ गए हैं और फिर दौरे पर निकल जाइए। बताते हैं कि साहसिक अफसरों के गले के नीचे से दो घूंट पहले ही उतर गया था। अबकी बार उम्मीद भी नीचे उतर गई। सूबे में अब अफसरों के दौरों से ज्यादा चर्चा बायोमेट्रिक के दौर की हो रही है। 

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हंटर

धान खरीदी में गड़बड़ी रोकने के लिए सरकार ने कड़ी निगरानी रखने की खूब कवायद की। सरकार ने एआई बेस्ड सिस्टम डेवलप किया था, जो जिलों से धान खरीदी की गड़बड़ी का अलर्ट पकड़ लेता था। मालूम चला कि प्रदेश भर में सर्वाधिक अलर्ट मुंगेली जिले से आया। आंकड़े बताते हैं कि करीब 780 अलर्ट पूरे प्रदेश से मिले थे। इनमें से अकेले 376 अलर्ट मुंगेली से रहे। हैरानी की बात यह रही कि इसमें से भी करीब 174 अलर्ट मुंगेली के एक ही फर्म से जुड़े राइस मिलों से थे। तफतीश में यह मालूम चला कि ये सभी राइस मिल एक स्थानीय भाजपा नेता से जुड़े थे, मगर अच्छी बात यह रही कि प्रशासन ने सख्ती का डंडा चलाया। भाजपा नेता से जुड़े राइस मिल समेत कुल 14 मिलों पर ताला जड़ दिया गया। कहानी यही खत्म नहीं हो जाती। प्रशासन की सख्ती पर भाजपा नेता ने खूब आंख दिखाई। जब बात मान मनौव्वल से नहीं बनी, तब उन्होंने दबाव की रणनीति अपनाई। चर्चा है कि करीब दो दर्जन विधायक, आधा दर्जन मंत्री, एक केंद्रीय मंत्री समेत संगठन के कई आला नेताओं से फोन कराकर प्रशासन पर खूब दबाव डाला गया, मगर जिला प्रशासन टस से मस नहीं हुआ। जाहिर है जिला प्रशासन के अधिकारियों पर सिफारिशों का बोझ बहुत भारी था, मगर सख्ती बरतने का हंटर चीफ सेक्रेटरी ने दे रखा था। भाजपा नेता भीगी बिल्ली बने बैठे रह गए। 

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चर्चा

सूबे में प्रशासनिक बदलाव की आहट शुरू हो गई है। इस दफे बदलाव की जद में मंत्रालय के कई सचिव भी आएंगे। ज्यादातर सचिव दो सालों से अपने पोर्टफोलियो पर काम कर रहे हैं। कुछ मंत्री हैं, जो अपने सचिवों से कम्फर्ट नहीं है। यह बात और है कि अगर मंत्रियों के कम्फर्ट लेवल को देखकर सचिव बिठाए जाने लगे तो फिर चल गई सरकार? चर्चा है कि एग्रीकल्चर, हेल्थ, अर्बन, एजुकेशन जैसे कई महत्वपूर्ण विभागों में बदलाव हो सकता है।