फरीदाबाद स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी( Al Falah University) को लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की हालिया जांच में कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। ईडी ने यूनिवर्सिटी के अल फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट और इसके संस्थापक जवाद अहमद सिद्दीकी के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल की है। जांच में यह पता चला कि यूनिवर्सिटी ने नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) को धोखा देने के लिए कई गड़बड़ियां की थीं। निरीक्षण से ठीक पहले फर्जी डॉक्टरों की भर्ती की गई, ताकि उन्हें नियमित स्टाफ दिखाया जा सके। इसके अलावा, अस्पताल में मरीजों की भीड़ दिखाने के लिए बिचौलियों की मदद ली गई और आनन-फानन में सुविधाएं तैयार की गईं।
रिपोर्ट के मुताबिक, ED ने बताया कि यूनिवर्सिटी ने छात्रों को लुभाने के लिए अपनी मान्यता को लेकर झूठे दावे किए। इस फर्जीवाड़े के कारण हजारों छात्रों के करियर और भविष्य के साथ खिलवाड़ हुआ है। जांच के दौरान एजेंसी को 9 शेल (फर्जी) कंपनियों का भी पता चला, जिनका इस्तेमाल यूनिवर्सिटी ने पैसों की हेराफेरी और धन शोधन के लिए किया। ED का कहना है कि ये कंपनियां सीधे यूनिवर्सिटी के ट्रस्ट और संस्थापक जवाद अहमद सिद्दीकी से जुड़ी थीं।
सिर्फ कागजों पर नियुक्ति
अधिकारियों ने ED के आरोपपत्र का हवाला देते हुए बताया कि मेडिकल कॉलेज में नियुक्त डॉक्टर केवल कागजों पर ही मौजूद थे। जांच में यह सामने आया कि उन्हें “सप्ताह में दो दिन” या 22 दिन पंच शिफ्ट जैसी शर्तों के तहत नियमित शिक्षक के रूप में दिखाया गया। इसका मकसद था कि नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) से जरूरी मंजूरी ली जा सके और अस्पताल की स्वास्थ्य सुविधा देखभाल इकाई बिना किसी रुकावट के चलती रहे।
अधिकारियों के अनुसार, ED ने यूनिवर्सिटी रजिस्ट्रार का बयान दर्ज किया है। रजिस्ट्रार ने जांच एजेंसियों द्वारा किए गए कंपस दौरे और विश्वविद्यालय अस्पताल से जुड़े डॉ. मुज़म्मिल और डॉ. शाहीन की गिरफ्तारी को स्वीकार किया। उन्होंने अपने बयान में बताया कि 2019 में स्थापित मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों को बिना किसी पुलिस सत्यापन के नियुक्त किया गया था। इस कदम से यह स्पष्ट होता है कि नियुक्तियों में प्रक्रियागत सुरक्षा और नियमों की अनदेखी की गई।
विश्वविद्यालय की कुलपति और प्राचार्य ने ED को बताया कि जिन डॉक्टरों पर आतंक से जुड़े मामलों में कथित तौर पर संलिप्त होने का आरोप लगाया जा रहा है, वे सभी उनके कार्यकाल में नियुक्त किए गए थे। उनमें शामिल हैं अक्टूबर 2021 से जनरल मेडिसिन विभाग में जूनियर रेजिडेंट डॉ. मुजम्मिल गनई, अक्टूबर 2021 से फार्माकोलॉजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शाहीन सईद, और कथित आत्मघाती बम धमाके में शामिल, मई 2024 से जनरल मेडिसिन में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. उमर नबी। कुलपति और प्राचार्य ने स्पष्ट किया कि इन नियुक्तियों में सभी प्रक्रियाएं उनके अधिकार क्षेत्र और नियमों के अनुसार की गई थीं।
कुलपति ने एजेंसी को बताया कि इन डॉक्टरों की नियुक्तियों की सिफारिश विश्वविद्यालय के मानव संसाधन प्रमुख ने की थी और इन्हें सिद्धिकी ने मंजूरी दी, जिसके बाद औपचारिक नियुक्ति पत्र जारी किए गए। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इन नियुक्तियों के समय किसी प्रकार की पुलिस जांच या सत्यापन नहीं किया गया।
जांच एजेंसी के अनुसार, पिछले साल 10 नवंबर को दिल्ली के लालकिला के पास विस्फोटक से भरी कार में धमाका हुआ था, जिसमें 15 लोग मारे गए और कई घायल हुए। इस धमाके में कार चला रहे डॉ. उमर नबी की मौत हो गई, जबकि डॉ. मुज़म्मिल गनई और डॉ. शाहीन सईद को एनआईए ने गिरफ्तार किया।
आरोपपत्र के एक दस्तावेज़ में डॉ. उमर नबी का नाम मेडिकल इकाई के नियमित डॉक्टर के रूप में भी शामिल किया गया है। विश्वविद्यालय के संस्थापक सिद्धिकी ने एजेंसी के सामने अपने बयान में कहा कि उनका किसी आतंकवादी या प्रतिबंधित संगठन से कोई संबंध नहीं है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) PMlA की धारा 50 के तहत धनशोधन जांच में विभिन्न व्यक्तियों के बयान दर्ज करता है और ऐसे बयान अदालत के सामने स्वीकार्य माने जाते हैं।
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