वीरेंद्र गहवई, बिलासपुर। हाईकोर्ट ने बच्चों की कस्टडी को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि बच्चे को सौतेली मां से वही प्यार और माहौल मिले, जो उसे अपनी सगी मां से मिल रहा है, इसकी गारंटी नहीं है। मां का प्यार सबसे ऊपर होता है। केवल बेहतर आर्थिक स्थिति होने से पिता बच्चे की कस्टडी का हकदार नहीं हो जाता। इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने दूसरी महिला के साथ रह रहे एक पिता की याचिका खारिज कर दी है। पिता ने हाईकोर्ट में याचिका लगाकर अपने 7 साल के बेटे की कस्टडी मांगी थी। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय के अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बैंच में हुई।

बता दें कि बेमेतरा जिले के कोड़वा निवासी लक्ष्मीकांत की शादी साल 2013 में हुई। उनके 2 बेटे हैं। पति-पत्नी के बीच आए दिन विवाद के कारण मामला हाईकोर्ट पहुंचा। लक्ष्मीकांत ने 7 साल के बेटे की कस्टडी की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अपील की थी। महिला के पति लक्ष्मीकांत ने बेमेतरा के फैमिली कोर्ट में परिवाद पेश किया था, जिसमें उसने अपने 7 साल के बड़े बेटे की कस्टडी मांगी थी। फैमिली कोर्ट ने पत्नी के पक्ष में फैसला देते हुए पति के परिवाद को खारिज कर दिया था। इस फैसले को पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पत्नी ने बताया कि उसका पति बिना तलाक लिए दूसरी महिला को पत्नी बनाकर घर में रखा है। पति ने भी यह स्वीकार किया कि उसका दूसरी महिला के साथ प्रेम संबंध है और उसने मंदिर में उससे शादी की है। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि बच्चे को उसकी सौतेली मां से वही प्यार और माहौल मिलेगा, जो उसे अपनी सगी मां से मिल रहा है। पिता की इस तर्क को हाईकोर्ट ने नहीं माना कि वह आर्थिक रूप से ज्यादा सक्षम है और पत्नी के पास आय का कोई साधन नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे का कल्याण केवल आर्थिक संपन्नता से तय नहीं होता, बल्कि उसके मानसिक और भावनात्मक विकास से होता है। हाईकोर्ट की डिवीजन बैंच ने कानूनों का हवाला देते हुए कहा कि कस्टडी तय करते समय माता-पिता के कानूनी अधिकारों की बजाय बच्चे का हित सबसे महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पिता की अपील को खारिज कर दिया।