Bastar News Update : बस्तर. बस्तर ब्लॉक के ग्राम सालेमेटा स्थित कोसारटेडा जलाशय क्षेत्र के किसानों के लिए जीवनरेखा माना जाता है. इस जलाशय से दो दर्जन से अधिक गांवों के करीब 11 हजार हेक्टेयर खेतों को खरीफ और रबी सीजन में सिंचाई का पानी मिलना तय है. खरीफ में अल्पवर्षा होने पर ही पानी की मांग रहती है, लेकिन रबी सीजन में फसल तैयार होने तक पानी अनिवार्य होता है. यही वह समय है जब दूरस्थ गांवों के किसान सबसे ज्यादा परेशान नजर आते हैं. जलाशय के आसपास के गांवों तक पानी पहुंच जाता है, लेकिन अंतिम छोर के किसान रबी फसल से वंचित रह जाते हैं. स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि जिले की यह एकमात्र माध्यम सिंचाई परियोजना है. समय के साथ जलाशय की भूमिका बदली और अब इससे पेयजल आपूर्ति भी की जा रही है. फ्लोराइड प्रभावित गांवों को शुद्ध पानी देने के लिए फिल्टर प्लांट लगाया गया है. हालांकि इस सीजन जलाशय में पर्याप्त पानी मौजूद है, फिर भी संतुलन बड़ी चुनौती बना हुआ है. नजदीकी गांवों में किसान मक्के जैसी कम पानी वाली फसलें ले रहे हैं. नीचले हिस्सों में पानी भराव के कारण विकल्प सीमित हैं. किसानों का कहना है कि रबी सीजन में समान वितरण की ठोस व्यवस्था जरूरी है. वरना सिंचाई परियोजना का लाभ कुछ गांवों तक ही सिमट कर रह जाएगा.

बस्तर – कड़ी निगरानी में संपन्न हुई पीएससी परीक्षा

महिला एवं बाल विकास विभाग के अधीक्षक पद की भर्ती परीक्षा जिले में शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुई. शहर के दो परीक्षा केंद्रों पर सुबह 10 से दोपहर 1 बजे तक परीक्षा आयोजित की गई. कुल 1045 पंजीकृत अभ्यर्थियों में से 784 उम्मीदवार परीक्षा में शामिल हुए. प्रशासन ने परीक्षा की शुचिता बनाए रखने के लिए सख्त इंतजाम किए थे. प्रवेश से पहले मेटल डिटेक्टर से जांच अनिवार्य की गई. संचार साधनों के दुरुपयोग को रोकने जैमर लगाए गए थे. उड़नदस्ता दल लगातार केंद्रों का निरीक्षण करता रहा. निर्धारित समय के बाद किसी भी परीक्षार्थी को प्रवेश नहीं दिया गया. ड्रेस कोड का सख्ती से पालन कराया गया..परीक्षा केंद्रों में केवल आवश्यक दस्तावेज और पेन की अनुमति रही. पीएससी सदस्य ने व्यवस्थाओं का जायजा लिया. प्रशासनिक अमले की सक्रियता से परीक्षा बिना किसी बाधा के पूरी हुई. अभ्यर्थियों ने भी व्यवस्थाओं को संतोषजनक बताया.

बस्तर – ‘पंडुम’ शब्द पर आदिवासी समाज की असहमति

बस्तर में आयोजित सरकारी कार्यक्रम के नाम को लेकर एक बार फिर विरोध सामने आया है. सर्व आदिवासी समाज ने ‘पंडुम’ शब्द के उपयोग पर आपत्ति दर्ज कराई है. समाज का कहना है कि पंडुम शब्द उनकी पारंपरिक आस्था से जुड़ा है. इसे सरकारी आयोजन के रूप में प्रस्तुत करना भावनाओं को ठेस पहुंचाता है. इसी मांग को लेकर समाज के प्रतिनिधियों ने ज्ञापन सौंपा. ज्ञापन में शब्द को सरकारी आयोजन से हटाने की मांग की गई. समाज ने इसे सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा विषय बताया. प्रतिनिधियों का कहना है कि परंपराओं के साथ समझौता स्वीकार्य नहीं है. उन्होंने प्रशासन से संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेने की अपील की. मामले को लेकर क्षेत्र में चर्चा तेज हो गई है. समाज का स्पष्ट कहना है कि विकास के साथ संस्कृति का सम्मान जरूरी है. अब प्रशासन के निर्णय पर सभी की निगाहें टिकी हैं.

नारायणपुर – मुर्गा लड़ाई के दौरान व्यक्ति घायल

नारायणपुर जिले में पारंपरिक मुर्गा लड़ाई के दौरान एक गंभीर हादसा हो गया. खेल के दौरान एक मुर्गा अचानक उछलकर दर्शक पर जा गिरा. मुर्गे के पैर में बंधा धारदार चाकू सीधे व्यक्ति को जा लगा. घटना में 44 वर्षीय व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया. हाथ और पेट के पास गहरे घाव आए, जिससे अत्यधिक रक्तस्राव हुआ. घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई. घायल को तत्काल जिला अस्पताल पहुंचाया गया. डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार के बाद भर्ती किया. फिलहाल घायल की हालत स्थिर बताई जा रही है. इस घटना ने ऐसे आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि सावधानियां बेहद जरूरी हैं. परंपरा के नाम पर जान जोखिम में डालना उचित नहीं. प्रशासन से नियम तय करने की मांग उठने लगी है.

सुकमा – 47 परिवारों ने की मूल धर्म में वापसी

जिले के कोंटा ब्लॉक में सामाजिक एकता का बड़ा उदाहरण सामने आया है. दोरला समाज के सम्मेलन में 47 परिवारों की घर वापसी कराई गई. ये परिवार पहले समाज से अलग होकर अन्य धर्म में चले गए थे. सम्मेलन में उन्हें सम्मानपूर्वक पुनः समाज में शामिल किया गया. समाज के नेताओं ने इसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण बताया. कार्यक्रम में हजारों परिवारों की भागीदारी रही.
समाज ने सामाजिक सुधार के लिए कड़े नियम भी तय किए. विवाह और सामाजिक मर्यादा को लेकर स्पष्ट दिशा तय की गई. फिजूलखर्ची रोकने के लिए डीजे और शराब पर प्रतिबंध लगाया गया. आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए सहयोग की व्यवस्था की गई. वक्ताओं ने समाज को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की अपील की. युवाओं से संस्कृति को आगे बढ़ाने का आह्वान किया गया. सम्मेलन ने सामाजिक अनुशासन का संदेश दिया.

बस्तर – युवा नेतृत्व को नई जिम्मेदारी

बस्तर में सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग की नई जिला कार्यकारिणी का गठन हुआ. सर्वसम्मति से बसंत कश्यप को जिला अध्यक्ष चुना गया. नई टीम को संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई. युवा नेतृत्व को समाज के मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया गया. वन अधिकार, जल-जंगल-जमीन जैसे विषय प्राथमिकता में रखे गए. अवैध जमीन खरीदी-बिक्री के खिलाफ संघर्ष का संकल्प लिया गया. नवनियुक्त पदाधिकारियों को समाज के वरिष्ठों का मार्गदर्शन मिला. नेतृत्व परिवर्तन को संगठन के लिए सकारात्मक कदम बताया गया. युवाओं में उत्साह और जिम्मेदारी दोनों नजर आई. कार्यकारिणी को जनहित के मुद्दों पर संघर्ष की चुनौती मिली है. नवीन नेतृत्व से समाज को नई दिशा मिलने की उम्मीद है. युवाओं ने एकजुट होकर काम करने का संकल्प लिया. बैठक में बड़ी संख्या में समाज के लोग मौजूद रहे.

बस्तर – आस्था के रथ असुरक्षित

शहर का ऐतिहासिक सिरहासार चौक इन दिनों अव्यवस्था का शिकार है. दशहरा और गोंचा पर्व के पवित्र रथ यहीं रखे जाते हैं. लेकिन अब यह स्थान शराबखोरी और गंदगी का केंद्र बनता जा रहा है. मद्यप्रेमी रथों में बैठकर शराब पीते नजर आते हैं.
रथों की सुरक्षा के लिए लगाए गए बेरिकेट हटाए जा चुके हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि रथों की गरिमा खतरे में है. चाट ठेला वालों के कारण क्षेत्र में अव्यवस्था फैल रही है. लंबे समय से संरक्षण की मांग उठाई जा रही है. इसके बावजूद जिम्मेदार संस्थाएं उदासीन बनी हुई हैं. कुछ लकड़ियां गायब होने की बात भी सामने आई है. नागरिकों ने रथों को सुरक्षित स्थान पर रखने की मांग की है. आस्था से जुड़े स्थल की अनदेखी पर नाराजगी बढ़ रही है. प्रशासन से जल्द कार्रवाई की अपेक्षा की जा रही है.

बस्तर – गन्ने की घटती खेती का गुड की कीमतों पर असर

बस्तर में गन्ने की खेती लगातार सिमटती जा रही है. इसका सीधा असर गुड़ की कीमतों पर पड़ा है. बाजार में गुड़ 70 से 80 रुपये प्रति किलो बिक रहा है. किसानों का कहना है कि गन्ने की खेती मेहनत और समय दोनों मांगती है. इसी कारण किसान दूसरी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. कभी इंद्रावती और नारंगी नदी किनारे गन्ने की भरपूर खेती होती थी. उत्पादन घटने से शक्कर कारखाने की योजना भी अधूरी रह गई. अब सीमांध्र क्षेत्र के किसान बस्तर में गन्ने की खेती कर रहे हैं. वे अधेया पर जमीन लेकर गुड़ बनाकर बाहर बेच रहे हैं. स्थानीय किसान इस खेती से दूर होते जा रहे हैं. कृषि विभाग के आंकड़े भी रकबे में लगातार गिरावट दिखाते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि सही प्रोत्साहन से खेती फिर बढ़ सकती है. नहीं तो बस्तर गुड़ के लिए बाहरी निर्भरता बढ़ेगी.