तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने एक बार फिर विधानसभा में अपना भाषण पढ़ने से इनकार कर दिया और बिना संबोधन दिए सदन से बाहर चले गए. सदन की कार्यवाही जैसे ही शुरू हुई तो स्पीकर एम अप्पावु ने राज्यपाल से नियमों का पालन करने और सरकार द्वारा तैयार भाषण ही पढ़ने को कहा. स्पीकर ने कहा कि सदन में केवल विधायक ही राय दे सकते हैं, कोई और नहीं.

इस पर राज्यपाल रवि ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मेरा भाषण बीच में रोका गया. मैं निराश हूं. राष्ट्रगान को उचित सम्मान नहीं दिया गया. इसके बाद वे सदन से बाहर चले गए. राज्यपाल रवि ने आरोप लगाया कि उनका माइक बार-बार बंद किया गया. बाद में राजभवन ने बयान जारी कर कहा कि तैयार किए गए भाषण में कई निराधार दावे और गुमराह करने वाले बयान थे. राज्यपाल ने 12 लाख करोड़ रुपये के निवेश के दावे को सच से दूर बताया और कहा कि कई MOU सिर्फ कागजों पर हैं.

केवल कागजों पर हुए समझौते- राज्यपाल

लोक भवन के बयान में आरोप लगाया गया है कि डीएमके सरकार का यह दावा कि तमिलनाडु में 12 करोड़ रुपये से अधिक का भारी निवेश हुआ है. सच से परे है और संभावित निवेशकों के साथ हुए कई समझौते केवल कागजों पर ही रह गए हैं. बयान में आगे कहा गया है, “वास्तविक निवेश तो इसके एक अंश मात्र है. निवेश के आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु निवेशकों के लिए कम आकर्षक होता जा रहा है. चार साल पहले तक तमिलनाडु राज्यों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त करने वाला चौथा सबसे बड़ा राज्य था. आज यह छठे स्थान पर बने रहने के लिए संघर्ष कर रहा है.”

’55 प्रतिशत से अधिक पॉक्सो के मामले’

बयान में आगे आरोप लगाया गया है कि महिलाओं की सुरक्षा के मामले को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है, जबकि मामलों में भारी वृद्धि हुई है. 55 प्रतिशत से अधिक पॉक्सो और 33 प्रतिशत से अधिक महिलाओं के साथ छेड़छाड़ के मामले हैं. लोक भवन के बयान में कहा गया, “दलितों के खिलाफ अत्याचार और दलित महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा में तेजी से वृद्धि हो रही है और इसे पूरी तरह से अनदेखा किया जा रहा है.”

‘युवाओं का भविष्य हो रहा प्रभावित’

बयान में कहा गया है कि शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है और शिक्षण संस्थानों में व्यापक कुप्रबंधन हमारे युवाओं के भविष्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है. 50 प्रतिशत से अधिक संकाय पद खाली हैं. आगे कहा गया है कि हमारे युवा एक अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहे हैं. ऐसा लगता है कि सरकार को इसकी कोई परवाह नहीं है और इस मुद्दे को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है.

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