लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को लेकर मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने अहम टिप्पणी की है। एक मामले पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा है सुरक्षा तभी मिलेगी, जब उन्हें पत्नी का दर्जा दिया जाए। कोर्ट ने कहा कि ऐसे रिश्तों में महिलाओं को वैवाहिक सुरक्षा नहीं मिल पाती इसलिए कोर्ट की जिम्मेदारी बनती है कि महिलाओं को संरक्षण दें। जस्टिस एस श्रीमथी ने यह टिप्प्णी एक आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए की। शख्स पर आरोप है कि वह महिला के साथ पहले लिव-इन में रहा। फिर शादी का झूठा वादा कर महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाए।

इस पर कोर्ट ने कहा कि पुरुष पहले मॉडर्न बनकर लिव-इन का रिश्ता बनाते हैं। बाद में रिलेशनशिप खराब होने पर महिला के कैरेक्टर पर सवाल उठाते हैं। वे ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि कानून में लिव-इन को लेकर कोई नियम नहीं हैं।

क्या था पूरा मामला

पीड़ित ने कहा कि वे और आरोपी स्कूल से एक-दूसरे को जानते थे, बाद में रिलेशनशिप में आए। अगस्त 2024 में दोनों घर से भाग गए और शादी करने का मन बनाया। लेकिन महिला के परिवार ने गायब होने की शिकायत दर्ज कराई और पुलिस ने कपल को पकड़कर घर पहुंचा दिया। बाद में आरोपी एग्जॉम देने के बहाने शादी टालता रहा। इस दौरान उनके बीच शारीरिक संबंध भी बने। रिश्ता बाद में टूट गया और महिला ने धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई। आरोपी ने अग्रिम जमानत मांगी और कहा कि रिश्ता सहमति से था। उसे महिला के पिछले बॉयफ्रेंड के बारे में जानकारी मिली, जिससे उसने रिश्ता तोड़ दिया। आरोपी ने बेरोजगारी और आर्थिक तनाव का हवाला देते हुए शादी नहीं करने के कारण बताए।

कोर्ट ने जमानत याचिका क्यों खारिज की

जमानत याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि बीएनएस की धारा 69 धोखे से यौन संबंध बनाने को अलग अपराध बनाती है, भले ही यह बलात्कार के बराबर न हो। जस्टिस श्रीमथी ने कहा कि पहले ऐसे मामलों को IPC की धोखाधड़ी या बलात्कार की धाराओं के तहत देखा जाता था। नए आपराधिक कानून के तहत संसद ने शादी का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाने को अलग अपराध बनाया है। चूंकि आरोपी ने शादी करने से इनकार किया, इसलिए अदालत ने कहा कि धारा 69 के तहत मुकदमा चलाना अनिवार्य था और अपराध की गंभीरता को देखते हुए कस्टोडियल जांच जरूरी थी।

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