झारखंड की सियासत में इन दिनों ‘ऑल इज नॉट वेल’ के हालात नजर आ रहे हैं. सत्ताधारी महागठबंधन की प्रमुख घटक दल कांग्रेस के भीतर आंतरिक दबाव इस कदर बढ़ गया है कि पार्टी के पांच विधायक रांची छोड़ दिल्ली में कैंप कर रहे हैं. चर्चा है कि यह बगावत पार्टी के अपने ही मंत्रियों के खिलाफ है, जिससे गठबंधन सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठने लगे हैं. दिल्ली में डेरा डालने वाले विधायकों में राजेश कच्छप, नमन विक्सल कोंगड़ी, भूषण बाड़ा, सोनाराम सिंकु और सुरेश बैठा शामिल हैं. चर्चा है कि यह बगावत पार्टी के अपने ही मंत्रियों के खिलाफ है, जिससे गठबंधन सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठने लगे हैं.
दिल्ली में डेरा डालने वाले इन विधायकों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि हेमंत सरकार में कांग्रेस कोटे से बने मंत्री उनकी बातों को अनसुना कर रहे हैं. विधायकों का आरोप है कि हेमंत सोरेन सरकार के भीतर कांग्रेस कोटे से बने मंत्रियों के पास अपने ही दल के जन प्रतिनिधियों के मुद्दों के लिए समय नहीं है, तो आम कार्यकर्ताओं और जनता की सुनवाई कैसे होती होगी.
विधायकों की मांग है कि महागठबंधन सरकार में संतुलन बनाए रखने के लिए योग्य और अनुभवी कांग्रेस विधायकों को भी मंत्री बनने का अवसर दिया जाना चाहिए. कुछ विधायकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनमें से कई उच्च शिक्षित हैं, कुछ के पास डबल एमए की डिग्री है और उन्होंने 20-25 वर्षों तक पार्टी के लिए संघर्ष किया है. ऐसे में उनका सवाल है कि अगर उन्हें मौका नहीं मिलेगा तो पार्टी के प्रति समर्पण का मूल्य क्या रह जाएगा.
सूत्रों के अनुसार, इन विधायकों ने अपनी नाराजगी पार्टी प्रभारी गुलाम अहमद मीर, महासचिव के.सी. वेणुगोपाल और झारखंड प्रभारी प्रणव झा के सामने रखी है. अब ये विधायक गुरुवार शाम कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से भी मुलाकात कर अपनी बात रखने वाले हैं.
प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि विधायक आलाकमान से मिलने संगठनात्मक मुद्दों को लेकर गए हैं. झारखंड में एसआईआर लागू होना है और हर बूथ पर बीएलओ की नियुक्ति की जिम्मेदारी विधायकों को दी गई है, ताकि किसी भी वास्तविक मतदाता का नाम सूची से न कटे.
भाजपा ने इस मुद्दे पर कांग्रेस और हेमंत सरकार पर हमला बोला है. भाजपा प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने कहा कि कांग्रेस विधायकों की नाराज़गी सरकार के लिए एक रियलिटी चेक है. उन्होंने आरोप लगाया कि मंत्री ऐशो-आराम में डूबे हैं और उनके सरकारी आवास ‘व्हाइट हाउस के छोटे संस्करण’ जैसे हैं, जहां आम जनता पहुंच ही नहीं सकती. शाहदेव ने सरकार को नॉन-सीरियस बताते हुए कहा कि इसका जनता से कोई सीधा सरोकार नहीं रह गया है.
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