Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

जो उखाड़ना है, उखाड़ लो

‘पावर सेंटर’ के हालिया स्तंभ में हमने लिखा था कि हर तरफ बाबाओं का शोर है और बाबाओं में श्रद्धा का निवेश इस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है। हर कोई इन बाबाओं में अपने-अपने हिस्से का लाभ ढूंढ रहा है। राजधानी के एक भू माफिया ने सबसे पहले बाबा को लांच किया था। उसने बाबा की खूब कथा कराई। भव्य मंच सजाया। लाखों की भीड़ जुटाई। नेता-मंत्री, अफसर, कारोबारी सब बाबा के सामने दंडवत होते दिखने लग गए। भू माफिया ने बाबा की कथा में कारोबार ढूंढ लिया। ‘लोक’ नहीं, मगर यह ‘लोग’ कथा है कि भू माफिया ने बाबा को अपना हिस्सेदार बना लिया है। बीते कुछ सालों में पूरे देश में बाबा की सर्वाधिक कथा अगर किसी राज्य में हुई है, तो वह छत्तीसगढ़ ही रहा है। बाबा यहां आते रहे। कथा करते रहे और इसके साथ-साथ भू माफिया का जमीन कारोबार खूब फलता फूलता रहा। कहा जाता है कि बाबा की कथा में लगे दान पात्र ने भक्तों के चढ़ावे की रकम खूब उगली है, जो करोड़ों में है। इसका एक हिस्सा बाबा की झोली में गया और एक हिस्सा भू माफिया की जेब में। बतकही में लोग कहते हैं कि बाबा का नया रुप राजनीति की कोख से जन्मा है। बड़े-बड़े नेता बाबा के शागिर्द हैं, सो अब बाबा, नेता और भू माफिया की जुगलबंदी हो गई है। सत्ताधारी दल के नेता सार्वजनिक मंच से भू माफिया को धर्म सम्राट की उपाधि से नवाजने लग गए हैं। जमीन से उठकर अब बाबा चार्टर्ड फ्लाइट से आसमान में उड़ रहे हैं और इधर जिंदगी के संघर्षों के बीच अपनी परेशानियों का समाधान ढूंढता बेबस और आम आदमी बाबा के पंडालों में जुट रहा है। खैर, आइए अब बाबा की कथाओं से होने वाली कमाई का आंकलन कर लेते हैं। बाबा की एक कथा में करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। कथा सुनने लाखों की भीड़ जुटती है। आमतौर पर बाबा की कथा 5 से 7 दिन की होती है। हर दिन औसतन एक लाख भक्त जुटते हैं। अगर प्रति भक्त एक सौ रुपए का ही औसत निकाला जाए तो हर दिन की कमाई एक करोड़ रुपए होती है। पांच दिन की कथा के लिए करीब पांच करोड़ रुपए और सात दिन की कथा के हिसाब से सात करोड़ रुपए का चढ़ावा चढ़ता है। इतना ही नहीं बाबा के मंच से बैकुंठ लोक की सीधी टिकट काटी जाती है। मंच से आयोजक लगातार यह उद्घोष करते हैं कि अस्पताल, स्कूल, गौ शाला के निर्माण के लिए भक्त जन मुक्त हस्त से दान कर सीधे बैकुंठ लोक में अपनी जगह आरक्षित कर सकते हैं। अब जहां हर दिन एक लाख भक्तों की भीड़ जुट रही हो, वहां कुछ हजार तो ऐसे होते ही हैं, जो ज्यादा चढ़ावा चढ़ाकर बैकुंठ लोक की टिकट हासिल करने का सपना लेकर आते हैं। यह गोपनीय चढ़ावा होता है। बहरहाल शहर के भू माफिया ने धर्म की आड़ में कमाई के इस तिलिस्म को समझ लिया है और बाबा की बुकिंग का पेटेंट हासिल कर रखा है। नेता बखूबी बाबा की हैसियत समझते हैं और यह भी कि राज्य के भीतर भू माफिया ही बाबा की असली परछाई है, सो भू माफिया को नेताओं का खुला संरक्षण मिल रहा है। एक मर्तबा खुद को मंत्री-विधायक से ऊपर बता चुका यह भू माफिया आज भी नेताओं की गोद में बैठकर सिस्टम को ठेंगा दिखा रहा है और सिस्टम को सीधी चुनौती देते कह रहा है, जो उखाड़ना है, उखाड़ लो।

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गाली 

सरकार की शासन प्रणाली में एक ऐसी व्यवस्था है, जिसने खुद ब खुद अपनी जगह बनाई है। यह बरसो से लागू व्यवस्था है। यह है, गाली आधारित शासन प्रणाली। अफसर का ओहदा जितना ऊंचा उसकी गाली उतनी भारी। हाल ही में नगरीय प्रशासन विभाग के संचालक महोदय ने एक वीडियो कान्फ्रेंसिंग के दौरान इस प्रणाली का बखूबी इस्तेमाल किया। संचालक महोदय ने जो गालियां दी थी, वह सब दोयम दर्जे की थी, जिसे आमतौर पर बोलचाल में इस्तेमाल कर लिया जाता है। जैसे- हरामखोर, चोर, बुडबक इत्यादि। दरअसल ये सिर्फ गालियां भर नहीं है, ये प्रशासनिक विशेषण हैं। इनका प्रयोग सुनियोजित होता है और केवल उन्हीं पर किया जाता है, जिनसे काम लिया जाना है। पहले दर्जे पर आने वाली गालियों का अपना विशेषाधिकार है। ये रोजमर्रा के लिए नहीं होती। ये तभी दी जाती हैं, जब सिस्टम बहुत ज्यादा हैंग कर जाए या अफसर का धैर्य टूट जाए। हाल ही में एक वीडियो कान्फ्रेंसिंग के दौरान एक सचिव महोदय का धैर्य जब टूट गया, तब उन्होंने एक अफसर की मां को खूब याद किया। उन्होंने कहा इस (—-) से काम नहीं होगा। अच्छी बात यह रही कि जिस अफसर की ओर यह लक्षित किया गया था, वह तकनीकी कारणों से यह गाली सुन नहीं सका। यह सरकार की आईटी नीति की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक घटना थी। गाली उस अफसर के कानों से न चिपक सकी। दरअसल, सरकारी ढांचे में ऊपर बैठे अफसरों को यह अघोषित विशेषाधिकार प्राप्त है कि वे अपने मातहतों की मां-बहनों का उल्लेख बिना किसी झिझक के कर सकते हैं। यह अधिकार उनकी नियुक्ति पत्र में दर्ज नहीं है, लेकिन स्वाभाविक तौर पर यह मिल ही जाता है। पहले यह परंपरा पुलिस विभाग में फली-फूली, फिर बाद में प्रशासन ने इसे अपना लिया। खैर, अब नगरीय प्रशासन विभाग के संचालक महोदय पर लौटते हैं। यकीनन वे एक आदर्श अफसर हैं। सुबह वक्त पर दफ्तर आ जाते हैं और देर शाम लौटते हैं। ईमानदारी उनके व्यक्तित्व का स्वभाव है। रिजल्ट ओरिएंटेड भी हैं। बस एक छोटी सी समस्या है कि उन्हें अपने विभाग का हर दूसरा आदमी कामचोर लगता है। इसलिए उनकी मीटिंग में उनकी गालियां मातहतों के लिए प्रेरणा का काम करती हैं। यह अचरज की बात नहीं कि इससे फाइले तेजी से सरकती भी हैं और काम भी होता है। सरकारी तंत्र में काम कराने के तरीके मायने नहीं रखते, नतीजे मायने रखते हैं। नगरीय प्रशासन संचालक ने अपने अनुभव से यह सब सीखा है। 

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वर्चस्व की लड़ाई

आख़िरकार रायपुर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू हो गई। बाहर से देखने पर यह एक प्रशासनिक सुधार का नया अध्याय दिखता है, लेकिन भीतरखाने यह अधिकार और वर्चस्व की एक गहरी लड़ाई का परिणाम है। इस बार यह संघर्ष इतना तीव्र था कि उसकी गर्माहट का धुआं साफ-साफ दिखाई देने लगा। दरअसल मुद्दा केवल कमिश्नर प्रणाली लागू करने तक सीमित नहीं था। असल प्रश्न यह था कि निर्णय और नियंत्रण की वास्तविक कमान किसके हाथ में रहेगी। इस निर्णायक मोड़ पर आईएएस लॉबी एक साथ खड़ी दिखाई दी, जबकि आईपीएस बिरादरी कई दिशाओं में खिंचती हुई और आपस में उलझती रह गई। आईएएस लॉबी ने वही किया, जो वह वर्षों से करती आई है। चुपचाप, संगठित ढंग से और नियम-प्रक्रियाओं में निहित प्रावधानों की ऐसी सधी हुई बुनावट की कि परिणाम स्वाभाविक रूप से उसके पक्ष में चले गए। दूसरी ओर आईपीएस बिरादरी अपनी ही नूरा-कुश्ती में उलझी रही और निर्णायक क्षण हाथ से फिसल गया। यह तथ्य अब किसी से छिपा नहीं है कि तमाम आंतरिक मतभेदों के बावजूद आईएएस लॉबी संगठित रहती है। जैसे ही बात कैडर के रसूख पर आती है, व्यक्तिगत असहमतियां दूर हो जाती हैं, फिर वहां समझौते नहीं होते, बल्कि सामूहिक हित पर अडिग रहने का निर्णय होता है। इसके उलट आईपीएस लॉबी में संगठनात्मक एकजुटता का अभाव लगातार गहराता गया है। आंतरिक अंर्तविरोध इतने प्रबल हैं कि अधिकारी एक-दूसरे को पटखनी देने का कोई मौका नहीं छोड़ते। बाहरी चुनौती से जूझने के बजाय अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा व्यक्तिगत वर्चस्व की लड़ाई में खत्म कर देते हैं। बीते कुछ वर्षों में सूबे की आईपीएस बिरादरी ने जो आत्मघाती कुश्ती लड़ी है, उसे हर किसी ने देखा है। इसका दुष्परिणाम केवल कुछ अधिकारियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी सेवा की संस्थागत साख ही गिर गई।

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उबड़ खाबड़

जंबूरी आयोजन पर छिड़ी सियासी रार पर अब कोई चर्चा नहीं है। लगता है सभी पक्षों को ठीक-ठाक ढंग से समझा दिया गया है। खैर, अच्छी बात है। सरकार के भीतर विवाद के केंद्र खड़े होने से पहले ही उसे ध्वस्त कर देना चाहिए। मगर विवाद का जो बीच रोपा गया था, उसका पौधा अब उठ खड़ा हुआ है। दरअसल आयोजन के पहले ही विभाग के आला अफसरों ने नियमों की भाषा में एक साधारण सी बात कही थी। टेंट पीडब्ल्यूडी लगाए, बिजली कंपनी बिजली दे, पानी और स्वच्छता पीएचई देखे। विशेषज्ञ विभाग अपना काम करेंगे और जिम्मेदारी बटी रहेगी, तो बेहतर होगा। बकायदा नोटशीट में यह सुझाव आला अफसर ने दिया था। यह सुझाव केवल शासन के बुनियादी उसूलों की याद दिला रहा था, लेकिन मंत्री महोदय को यह सीधा रास्ता पसंद नहीं आया। उन्होंने आला अफसरों के सुझावों वाली नोटशीट को कूड़ेदान में डलवा दिया। फिर आदेश हुआ कि पूरे आयोजन का बजट डीईओ को भेजा जाए। इस फैसले के साथ ही जंबूरी घोटाले की नींव चुपचाप रख दी गई। विशेषज्ञ विभागों को हटाकर सब कुछ एक जगह समेट देना सुविधा भले लगा हो, मगर यह सुविधा ही आगे चलकर संकट बन गई। सीधा सपाट रास्ता छोड़ आयोजनकर्ताओं ने उबड़ खाबड़ रास्ता चुन लिया। अब विधानसभा का बजट सत्र सामने है। विपक्ष तो सवाल करेगा ही, लेकिन सत्ता पक्ष के भीतर की बेचैनी भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वही नोटशीट, जिसे बेकार समझकर फेंक दिया गया था, अब संदर्भ बन सकती है। शासन में कागज कभी नष्ट नहीं होते, वे सिर्फ मौन हो जाते हैं और सही समय पर बोलते हैं।

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मूषक विधायक

रूलिंग पार्टी के कई विधायक मूषक बन गए हैं। ऐसा मूषक जो अपने ही किले की नींव को खोद रहा है। वक्त रहते इन मूषकों का इलाज नहीं किया, तो किले का कमजोर होना तय है। अपने-अपने इलाकों में इन मूषकों के उत्पात मचाने के ढेरों किस्से सार्वजनिक हैं, लेकिन अबकी बार जो कहानी सुनी जा रही है यह हैरान करने वाली है। मूषक बने कुछ विधायक स्थानीय स्तर पर तैयार होने वाली विकास योजनाओं के प्रस्ताव से जुड़ी चिट्ठी लिखने के लिए पैसा मांग रहे हैं। एक अधिकारी ने बताया कि विधायक को जब यह समझाया गया कि यह तो सिर्फ प्रस्ताव है। जमीन पर एक ढेले का काम नहीं हुआ है। होगा भी या नहीं? यह मालूम नहीं है। ऐसे में फिर पैसा मांगने का औचित्य समझ नहीं आ रहा। तब मूषक विधायक ने कहा, प्रस्ताव तो जा रहा है ना। स्याही की क़ीमत तो लगेगी ही। खैर, मूषक विधायकों का हाल बेहाल है। छोटे-छोटे कामों में भी इन्हें खाने के लिए मेवा चाहिए है।