सुशील खरे, रतलाम। जब पूरा देश गणतंत्र दिवस पर भारतीय संविधान का उत्सव मनाने की तैयारी कर रहा है, ठीक उसी से एक रात पहले मध्यप्रदेश के रतलाम जिले के ग्राम पंचेवा से सामने आया एक वीडियो लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों को कठघरे में खड़ा कर देता है। इसमें लव मैरिज करने वालों और उनके परिवारों को सामाजिक सजा देने की खुली घोषणा की जा रही है।
वीडियो में एक युवक यह ऐलान करता साफ सुनाई देता है कि अब गांव में यदि कोई लड़का या लड़की लव मैरिज करता है। विशेषकर अगर वह माता-पिता, समाज या जाति की मर्जी के खिलाफ अंतरजातीय या अपनी पसंद का विवाह करता है तो केवल उस युवक-युवती को ही नहीं, बल्कि उनके पूरे परिवार को सामाजिक रूप से बेदखल कर दिया जाएगा।
दूध, मजदूरी, संबंध खत्म
लव मैरिज करने पर अब जो सज़ा मिलेगी उसकी घोषणा यहीं नहीं रुकती। वीडियो में यह भी तय किया जाता है कि ऐसे परिवारों को गांव में दूध नहीं दिया जाएगा, मजदूरी पर नहीं बुलाया जाएगा, किसी भी शुभ या धार्मिक आयोजन में शामिल नहीं किया जाएगा। इसी के साथ गांव की बैठकों, चर्चाओं और सामूहिक फैसलों से बाहर रखा जाएगा और गांव के लोग उनसे मिलना-जुलना तक बंद कर देंगे। यह साफ तौर पर सामाजिक बहिष्कार के जरिए जीवन को असंभव बनाने की धमकी है।
भीड़ के बीच ऐलान
वीडियो का एक और गंभीर पहलू यह है कि जब यह घोषणा की जा रही थी, उस समय वहां कई अन्य युवक और ग्रामीण बैठे हुए थे। जो इस फैसले को मौन सहमति देते नजर आते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि यह किसी एक व्यक्ति की राय नहीं, बल्कि सामूहिक मानसिकता और भीड़ के फैसले का रूप ले चुका है। बड़ा सवाल यह है कि क्या गांव की ऐसी घोषणाएं संविधान से ऊपर जाकर लागू होंगी? इस बारे में कानून के जानकार रतलाम जिले के जाने माने वकील नवीन कुमावत का कहना है कि अपराध है वो भी गंभीर पुलिस को खुद संज्ञान लेना चाहिए
ASP ग्रामीण विवेक पाल का कहना है कि वीडियो की जांच की जा रही है। लेकिन अगर संविधान की बात करें तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 19 स्वतंत्रता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 21 हर नागरिक को सम्मान के साथ जीवन जीने और अपनी निजी पसंद के निर्णय लेने का अधिकार देता है। इसी के तहत सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह स्पष्ट कर चुका है कि दो वयस्कों को अपनी पसंद से विवाह करने का पूर्ण अधिकार है, चाहे वह विवाह समाज या परिवार की परंपराओं के खिलाफ ही क्यों न हो।
संविधान को चुनौती
इसके बावजूद पंचेवा गांव में जो ऐलान किया गया, वह न सिर्फ संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि युवक-युवती के साथ-साथ उनके माता-पिता, भाई-बहन को सजा देने की बात करना सीधे तौर पर कानून और मानवता दोनों के खिलाफ है। यह मामला इसलिए भी अधिक संवेदनशील है क्योंकि बहिष्कार सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि रोजगार और जीविका से जुड़ा हुआ है। दूध न देना, मजदूरी से वंचित करना, ये सब सीधे तौर पर जीने के अधिकार पर हमला हैं।
गणतंत्र दिवस के ठीक पहले पंचेवा गांव से जुड़ा यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। लेकिन अब तक जिला प्रशासन ने संज्ञान नहीं लिया है। वीडियो में खुलेआम संविधान विरोधी घोषणा की जा रही है, इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है। सोशल मीडिया पर ही टिप्पणी आ रही हैं कि यह मामला किसी सामाजिक मतभेद का नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों के खुले उल्लंघन का है। ऐसे में जिला प्रशासन क्या एक्शन लेता है उसका इंतजार है।
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