हर साल गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति की सवारी देश की सबसे खास झलकियों में गिनी जाती है. इस बार भी राष्ट्रपति ने जब यूरोपीय संघ के शीर्ष नेताओं के साथ जिस शाही बग्घी में सवार होकर कर्तव्य पथ पर प्रवेश किया, तो बग्घी ने लोगों की जिज्ञासा बढ़ा दी. सबकी नजर उस शाही बग्घी पर टिक जाती है. यह बग्घी सिर्फ शान और परंपरा का प्रतीक नहीं, बल्कि इतिहास का ऐसा मोड़ भी समेटे है, जहां किस्मत का एक पल भारत के पक्ष में गया. अगर उस दिन एक टॉस का नतीजा बदल जाता, तो शायद आज यह बग्घी भारत नहीं, पाकिस्तान की पहचान बन चुकी होती. बहुत कम लोग जानते हैं कि यह बग्घी भारत के लोकतांत्रिक इतिहास जितनी ही पुरानी है और इसका सफर आजादी से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी कहता है.
गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति खास बग्घी पर सवार होकर पहुंचती हैं. राष्ट्रपति की बग्घी आज भी उस ऐतिहासिक टॉस की गवाही देती है, जिसे भारत हार जाता तो बग्घी पाकिस्तान के पास होती.
राष्ट्रपति की यह बग्घी अंग्रेजी दौर की विरासत है. कभी वायसराय इसी बग्घी में सवार होकर सरकारी कार्यक्रमों में पहुंचते थे. इसकी बनावट बेहद भव्य है. बग्घी पर सोने की परत चढ़ी हुई है और दोनों ओर भारत का राष्ट्रीय चिन्ह भी सोने से ही जड़ा हुआ है. इसे खींचने वाले घोड़े भी खास तौर पर चुने जाते हैं. पहले इस बग्घी को छह ऑस्ट्रेलियाई घोड़े खींचते थे, लेकिन अब परंपरा के अनुसार चार घोड़ों का इस्तेमाल किया जाता है.
1947 में देश के बंटवारे के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच सिर्फ जमीन और सेना ही नहीं, बल्कि हर छोटी-बड़ी संपत्ति का बंटवारा हुआ. सरकारी इमारतों से लेकर सैन्य संसाधनों तक, सब कुछ नियमों के तहत बांटा गया. इसी प्रक्रिया में वायसराय की इस शाही बग्घी पर भी दोनों देशों ने दावा ठोक दिया. भारत और पाकिस्तान, दोनों ही इसे अपने-अपने देश की धरोहर मान रहे थे.
बग्घी को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि कोई सीधा समाधान नहीं निकल पाया. आखिरकार फैसला हुआ कि टॉस के जरिए तय किया जाए कि बग्घी किसे मिलेगी. भारत की ओर से तत्कालीन राष्ट्रपति अंगरक्षक रेजिमेंट के पहले कमांडेंट लेफ्टिनेंट कर्नल ठाकुर गोविंद सिंह मैदान में उतरे, जबकि पाकिस्तान की तरफ से साहबजादे याकूब खान मौजूद थे. सिक्का उछला और किस्मत ने भारत का साथ दिया. टॉस भारत के पक्ष में गया और शाही बग्घी भारत के हिस्से आ गई.
भारत में संविधान लागू होने के बाद 26 जनवरी 1950 को पहला गणतंत्र दिवस मनाया गया. उसी दिन देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इस शाही बग्घी में सवार होकर परेड स्थल पहुंचे थे. यह बग्घी तब से राष्ट्रपति की गरिमा, परंपरा और निरंतरता की प्रतीक बन गई. शुरुआती दशकों में राष्ट्रपति भवन के भीतर और आधिकारिक समारोहों में इसी बग्घी का इस्तेमाल किया जाता था.
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