दिल्ली के द्वारका इलाके में 2018 में देर रात हुई चेकिंग के दौरान पुलिसकर्मी पर गोली चलाने की कोशिश के मामले में दिल्ली की अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया है। कोर्ट ने आरोपी को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। इस फैसले के साथ ही 7 साल लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद आरोपी को न्याय मिल गया।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वंदना जैन ने अपने फैसले में प्रवीण कुमार को आईपीसी की धारा 186 (सरकारी कार्य में बाधा), 353 (सरकारी कर्मचारी पर हमला), 324, 307 (हत्या का प्रयास) के तहत लगाए गए सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। इसके साथ ही आरोपी को आर्म्स एक्ट की धारा 27 और मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185 से भी बरी किया गया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। कोर्ट ने जांच में गंभीर कमियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि प्रस्तुत साक्ष्य आरोपी के खिलाफ आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। करीब 7 साल तक चले मुकदमे के बाद आए इस फैसले से आरोपी को बड़ी राहत मिली है।
क्या था पूरा मामला
इस मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वंदना जैन ने आरोपी को आईपीसी की धारा 186, 353, 324 और 307 के तहत लगे आरोपों से बरी कर दिया। साथ ही उसे आर्म्स एक्ट की धारा 27 और मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185 से भी राहत दी गई।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक मामलों में अभियोजन पर यह कानूनी जिम्मेदारी होती है कि वह अपराध के हर पहलू को संदेह से परे साबित करे। न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिसकर्मियों की गवाही केवल इस आधार पर खारिज नहीं की जा सकती कि वे पुलिस से हैं, लेकिन ऐसी गवाही भरोसेमंद, सुसंगत और ठोस साक्ष्यों से समर्थित होनी चाहिए।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी रिकॉर्ड किया कि किसी भी पुलिस गवाह द्वारा ऐसी कोई डिपार्चर एंट्री पेश नहीं की गई, जिससे यह साबित हो सके कि घटना वाली रात वे आधिकारिक रूप से पिकेट पर तैनात थे। इसके अलावा, अभियोजन ने मौके पर भीड़ जुटने का दावा किया, लेकिन इसके बावजूद किसी भी स्वतंत्र गवाह को जांच में शामिल नहीं किया गया, जो जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है।
कांस्टेबल को कथित तौर पर लगे काटने के घाव को लेकर अदालत ने कहा कि न तो सलाइवा टेस्ट कराया गया और न ही कोई ऐसा विश्वसनीय मेडिकल परीक्षण कराया गया, जिससे यह प्रमाणित हो सके कि चोट वास्तव में आरोपी द्वारा ही पहुंचाई गई थी या वह स्वयं लगी चोट हो सकती थी।
कोर्ट ने आरोपी के मेडिकल रिकॉर्ड को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि एमएलसी में आरोपी के नशे में होने का उल्लेख तो किया गया है, लेकिन शराब की जांच (अल्कोहल टेस्ट) की कोई रिपोर्ट रिकॉर्ड पर पेश नहीं की गई। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल एमएलसी में नशे का उल्लेख होना, अपने आप में नशे की पुष्टि नहीं माना जा सकता, विशेष रूप से तब जब पूरे मामले में पहले से ही कई पहलुओं पर संदेह बना हुआ हो।
Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m
- छत्तीसगढ़ की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- उत्तर प्रदेश की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- लल्लूराम डॉट कॉम की खबरें English में पढ़ने यहां क्लिक करें
- खेल की खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
- मनोरंजन की बड़ी खबरें पढ़ने के लिए करें क्लिक





