अभय मिश्रा, मऊगंज। कानून अंधा होता है, यह तो सुना था, लेकिन मऊगंज का राजस्व अमला अंधा और बहरा दोनों नजर आ रहा है। मामला है देवतालाब उप-तहसील के नौडिया गांव का। जहां भारी पुलिस बल के साथ प्रशासन गरीबों के आशियाने उजाड़ने पहुंचा। लेकिन इस कार्रवाई के पीछे जो जमीन का खेल है, उसे सुनकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। एक पूर्व पटवारी का ऐसा रसूख कि उसने एक ही जमीन को चार बार बेच डाला और प्रशासन अब उसी जालसाजी का बोझ जमीन खरीदने वालों पर डाल रहा है।

मऊगंज के नौडिया गांव में प्रशासन की टीम पूरे लाव-लश्कर के साथ अतिक्रमण हटाने पहुंची है। लेकिन सवाल ये है कि क्या यह अतिक्रमण है या प्रशासनिक मिलीभगत का नतीजा? 50 साल से रह रहे लोगों के घरों को जमींदोज करने से पहले क्या प्रशासन ने फाइलों की धूल झाड़ना मुनासिब समझा?

ऐसे शुरू हुआ खेल

इस पूरे फसाद की जड़ है, सन 1988 की एक रजिस्ट्री। भगवानदीन पटेल नाम के एक रसूखदार पटवारी ने जमीन बेची, नामांतरण हुआ, लेकिन फिर खेल शुरू हुआ। भगवानदीन के भाई ने अपील की, खरीदारों का नाम कटवाया और जमीन फिर से अपने नाम कर ली। हैरानी की बात यह है कि जिस अपील के दम पर मालिकाना हक बदला गया, उसका रिकॉर्ड आज राजस्व विभाग के पास है ही नहीं।

एक जमीन पर चार बार रजिस्ट्री

इस खेल का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है भगवानदीन पटेल, जो खुद पेशे से पटवारी था। पटवारी की कुर्सी का रसूख देखिए-एक ही जमीन की चार बार रजिस्ट्री हुई। 1988 के बाद 2022 में फिर से खरीद-फरोख्त हुई। पटवारी साहब ने कानून की ऐसी धज्जियां उड़ाईं कि एक ही जमीन कई बार बिकी और प्रशासन कुंभकरणी नींद सोता रहा।

उठे ये सवाल

प्रशासन के अड़ियल रवैये ने लोगों को आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। किसी ने हाथ की नस काट ली, तो किसी ने खुद को घर में कैद कर लिया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मामला सिविल कोर्ट में है और स्टे ऑर्डर (स्थगन आदेश) लागू है, तो प्रशासन किस कानून के तहत घर गिराने पहुंचा ? क्या मऊगंज का राजस्व अमला खुद को माननीय न्यायालय से ऊपर मानता है ?

पटवारी ने चलाया कानूनी हंटर

हैरानी की पराकाष्ठा तो देखिए, जिस राजस्व विभाग के पास एक ही जमीन की चार बार हुई रजिस्ट्री के दस्तावेज नहीं हैं, जमीन कब और किसने सरकारी घोषित की उसके पुख्ता कागज नहीं हैं, वही अमला पूरी धौंस के साथ अतिक्रमण हटाने पहुंच गया और जब बेघर होते लोगों ने इस अन्याय का विरोध किया, तो कथित अतिक्रमण हटाने का काम तो रोक दिया गया लेकिन वर्तमान पटवारी ने उन पर ही कानूनी हंटर चला दिया। नौ लोगों पर सरकारी काम में बाधा पहुंचाने और गाली-गलौज जैसे आरोप लगाते हुए आवेदन दिया गया, जिसके आधार पर पुलिस ने तीन गंभीर धाराओं में मामला भी दर्ज कर लिया है।

अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई ?

आज नौडिया गांव के लोग अपनी ही जमीन पर बेगाने हो गए हैं। प्रशासन जिसे सरकारी जमीन बता रहा है, उसकी फाइल गायब है। जिसने 27 डिसमिल के हिस्से में 40 डिसमिल जमीन बेच दी, उस पटवारी पर अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई ? क्या प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ गरीबों का घर गिराना है, या उस सिस्टम को सुधारना भी है जो भ्रष्ट पटवारियों को फलने-फूलने का मौका देता है?

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