कर्ण मिश्रा, ग्वालियर। Special Story: ग्वालियर के राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय में एरोपोनिक्स तकनीक के जरिये हवा में आलू उगाए जा रहे है। मध्यप्रदेश का ग्वालियर एकमात्र ऐसी जगह है जहां से एरोपोनिक्स खेती के जरिये तैयार आलू के उन्नत बीज मध्यप्रदेश के किसानो को दिए जाएंगे।

दरअसल, ग्वालियर के राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय की ओर से कृषि क्षेत्र में नए नवाचार और रिसर्च किये जा रहे है। इसी कड़ी में विश्वविद्यालय परिसर में दो साल पहले स्थापित की गई एरोपोनिक्स इकाई में लम्बी रिसर्च के बाद हवा में आलू उगाया जा रहा है। शुरुआत में एक किलो उन्नत किस्म के आलू का बीज मिला। जिसके जरिये 400 किलो आलू के बीज नेट हाउस में तैयार कराए गए। जो अब कैम्पस में ही खुले में रोप गए है। उम्मीद है कि जल्द इन्हें किसानो को समर्पित कर दिया जाएगा।

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क्या होती है एरोपोनिक्स खेती

  • ऐरोपोनिक्स तकनीक के माध्यम से टिश्यू कल्चर द्वारा रोग मुक्त आलू के बीजों का उत्पादन किया जाता है।
  • ऐरोपोनिक तकनीक में पौधों की जड़ों को बिना मिट्टी के हवा में लटकाकर रखा जाता है।
  • ऐरोपोनिक प्रणाली में पौधों की जड़ो पर स्प्रिंगलर से पोषक तत्वों के घोल का छिड़काव किया जाता है।
  • पारंपरिक खेती की तुलना में ऐरोपोनिक पद्धति में 90% तक कम पानी की आवश्यकता होती है।
  • आलू के बीज से रोग मुक्त पौधे और 10 प्रतिशत अधिक उत्पादन मिलता है।
  • इस विधि के बीज से उत्पादन उन क्षेत्रों में भी किया जा सकता है जहां पर जुताई योग्य मिट्टी उपलब्ध नहीं होती है।

वर्तमान में एरोपोनिक्स इकाई में लगभग 6 हजार प्लांट मौजूद है। जिनमें आलू की 20 वैरायटीज ग्रो कर रही है। इनमें सबसे ज्यादा खास लेडी रोजेट जिसे एलआर के नाम से जाना जाता है। लाल रंग का यह आलू शुगर फ्री होता है, जो नीदलरलैंड की मुख्य पैदावर है। शिमला का जामुनी कलर वाला नीलकंठ आलू का बीज भी तैयार हो रहा है। इस आलू मे काफी एंटीऑक्सीडेंट होता है।

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इसके अलावा कुफरी बहार, कुफरी उदय सहित कुल 20 वैरायटीयां आलू के बीज प्रोड्यूज कर रही है। अभी तक कि रिसर्च के मुताबिक 50 से 60 दिनों में मिनी ट्यूबर यानी आलू का बीज जड़ो पर आ जाता है। इस स्टेप को जी जीरो कहा जाता है। यहां से जी वन स्टेप की शुरुआत नेटहाउस में होती है। यहां जमीन में आलू के बीज को रोपकर नए बीज तैयार किये जाते है। जी वन से मिले बीजो को जी टू यानी फील्ड में रोपा जाता है। यहां से तैयार बीज को फाइनली किसानों को दिया जाता है।

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