अमित पांडेय, खैरागढ़। खैरागढ़ रियासत की पहाड़ियों के बीच बसे कोड़ेनवागांव की चोटी पर स्थित खङ्गेश्वर महादेव मंदिर सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, श्रद्धा और शिल्पकला का जीवंत प्रमाण है. दूर से दिखाई देने वाला यह मंदिर आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है.

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स्थानीय जानकार भागवत शरण सिंह के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण राणा खङ्ग पद्म जंग बहादुर के संकल्प से हुआ था. वे खैरागढ़ राजपरिवार के दामाद थे. राजपरिवार से जुड़े दस्तावेजों के मुताबिक नागवंशी शासक परिवार की पुत्री राजेश्वरी देवी का विवाह राणा खङ्ग पद्म जंग बहादुर से हुआ था. इस रिश्ते के कारण उनका खैरागढ़ से गहरा जुड़ाव रहा.

मंदिर की स्थापना फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी, संवत 1883 को बताई जाती है. हालांकि, संवत और अंग्रेजी कैलेंडर की तिथि को लेकर मतभेद भी सामने आते हैं, जिस पर ऐतिहासिक पुष्टि की आवश्यकता है. इसके बावजूद स्थानीय लोगों की आस्था में कोई कमी नहीं आई है.

मंदिर पहाड़ी की चोटी पर बना है, जहाँ पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 57 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं. ये सीढ़ियाँ भले अलग-अलग आकार की हों, लेकिन हर कदम श्रद्धा से भरा होता है. ऊपर पहुंचते ही खुला प्रांगण और शांत वातावरण मन को सुकून देता है. मंदिर का गर्भगृह लगभग पाँच मीटर के आसपास वर्गाकार है, जहाँ संगमरमर के घेरे में स्थापित शिवलिंग पर तांबे के कलश से जल चढ़ाने की व्यवस्था है.

सभा मंडप इतना बड़ा है कि विशेष अवसरों पर बड़ी संख्या में भक्त एक साथ पूजा कर सकते हैं. प्रदक्षिणा पथ भी बनाया गया है, जिसमें हवा और रोशनी के लिए झरोखे दिए गए हैं. शिखर की बनावट नागर शैली से प्रभावित दिखाई देती है. ईंट और चुने से बना पिरामिडनुमा शिखर और ऊपर लगे कलश इसे अलग पहचान देते हैं. यह दर्शाता है कि निर्माण उस समय की पारंपरिक तकनीक और स्थानीय कारीगरों की कुशलता से हुआ.

महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष आयोजन होता है. आसपास के गांवों ही नहीं, दूर-दराज से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं. पूरी पहाड़ी हर-हर महादेव के जयकारों से गूंज उठती है. खङ्गेश्वर महादेव मंदिर आज भी इस बात का प्रमाण है कि जब आस्था और संकल्प साथ आते हैं, तो समय भी उसकी पहचान को मिटा नहीं पाता. जरूरत है कि इस ऐतिहासिक धरोहर का दस्तावेजीकरण और संरक्षण गंभीरता से किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस विरासत से जुड़ी रहें.