दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने स्पष्ट किया है कि बिना अनुमति ड्यूटी से गैरहाजिर रहने के लिए नकली मेडिकल सर्टिफिकेट लगाना गंभीर अनुशासनहीनता (सीरियस मिसकंडक्ट) है और इसके लिए कर्मचारी को नौकरी से भी हटाया जा सकता है। जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने कैट (सेंट्रल एंप्लॉयीज ट्रिब्यूनल) के आदेश को रद्द करते हुए इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट्स डिपार्टमेंट के एक क्लर्क की बर्खास्तगी को सही ठहराया। नकली मेडिकल सर्टिफिकेट से गैरहाजिरी करना गंभीर अनुशासनहीनता मानी गई। विभागीय कार्रवाई में “उचित संदेह से परे सबूत” का आपराधिक मानक लागू नहीं होता।

टीबी की बीमारी का दावा कर लगाए थे फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिवादी इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट्स डिपार्टमेंट का एक पुराना कर्मचारी था, जो 1991 में चपरासी के पद पर भर्ती हुआ और बाद में क्लर्क के तौर पर प्रमोट हुआ। वह सितंबर 2000 से अप्रैल 2003 तक लगातार ड्यूटी से गैरहाजिर रहा। उसने दावा किया कि उसे टीबी है और वापसी पर CGHS डिस्पेंसरी के चीफ मेडिकल ऑफिसर द्वारा जारी मेडिकल और फिटनेस सर्टिफिकेट जमा किए। डिपार्टमेंट ने सर्टिफिकेट की जांच की तो पाया कि वे CGHS द्वारा जारी नहीं किए गए थे। जिस डॉक्टर ने सर्टिफिकेट जारी किया, वह उस तारीख पर ड्यूटी पर नहीं था। सर्टिफिकेट में स्टैंडर्ड सीरियल नंबर भी नहीं थे। जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने कैट के आदेश को रद्द करते हुए क्लर्क की बर्खास्तगी को वैध ठहराया।

अनुशासनात्मक कार्रवाई में मिली थी नौकरी से निकालने की सजा

प्रतिवादी, इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट्स डिपार्टमेंट का कर्मचारी, सितंबर 2000 से अप्रैल 2003 तक लगातार ड्यूटी से गैरहाजिर रहा। उसने अपनी लंबी गैरहाजिरी को नियमित दिखाने के लिए नकली मेडिकल सर्टिफिकेट जमा किए और झूठे बयान दिए। डिपार्टमेंट ने पूरी जांच के बाद पाया कि सर्टिफिकेट असली नहीं थे और डॉक्टर उस समय ड्यूटी पर मौजूद नहीं थे। पूरी जांच के बाद डिसिप्लिनरी अथॉरिटी ने प्रतिवादी को नौकरी से निकालने की सजा दी। जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने कैट के आदेश को रद्द करते हुए बर्खास्तगी को वैध ठहराया।

कैट ने सजा पर लगाई थी रोक

प्रतिवादी ने सजा के आदेश को सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) में चुनौती दी। कैट ने नौकरी से निकालने के फैसले को रद्द कर दिया और माना कि बिना क्रिमिनल केस या एक्सपर्ट राय के जालसाजी साबित नहीं की जा सकती। इसके अलावा, कैट ने यह भी कहा कि सजा कम करने पर फिर से विचार किया जाना चाहिए।

CAG ने हाईकोर्ट में दी थी CAT के आदेश को चुनौती

भारत के कंट्रोलर और ऑडिटर जनरल (कैग) ने केंद्रीय सेवाओं के ट्रिब्यूनल (कैट) के एक आदेश के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की है। कैग ने याचिका में कहा है कि ट्रिब्यूनल ने बिना किसी शक के सीधे सबूत मांगकर और यह मानकर कि गलत काम साबित नहीं हो सकता, गलती की। याचिका में यह भी कहा गया है कि इस मामले में जालसाजी के लिए कोई क्रिमिनल केस शुरू नहीं किया गया था। इसके बावजूद, प्राइवेट तौर पर प्राप्त सर्टिफिकेट को CGHS (सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ सर्विसेस) के ऑफिशियल डॉक्यूमेंट के रूप में जमा करना ईमानदारी की कमी से जुड़ा गंभीर मिसकंडक्ट है। कैग ने अदालत से मांग की है कि ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द किया जाए और इस मामले में सही कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाए।

प्रतिवादी की क्या थी दलील

प्रतिवादी की दलील: दूसरी ओर, प्रतिवादी ने अदालत में कहा कि CCS (लीव) रूल्स, 1972 के तहत CGHS से खास तौर पर मेडिकल सर्टिफिकेट जारी करने की कोई जरूरत नहीं थी। उन्होंने बताया कि किसी भी ऑथराइज्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर से मिला सर्टिफिकेट ही पर्याप्त था। साथ ही यह भी कहा कि जांच इस गलत सोच पर आधारित थी कि सर्टिफिकेट अमान्य हैं क्योंकि उन्हें CGHS ने जारी नहीं किया था।

हाईकोर्ट ने डिसिप्लिनरी अथॉरिटी का ऑर्डर ठोस सबूतों पर आधारित था

दिल्ली हाईकोर्ट में कैग और कैट के आदेश को लेकर चल रहे मामले में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि डिसिप्लिनरी अथॉरिटी का ऑर्डर CGHS से वेरिफिकेशन और ठोस सबूतों पर आधारित था। सुनवाई में यह भी सामने आया कि संबंधित डॉक्टर सर्टिफिकेट जारी करने की तारीखों पर छुट्टी पर थे, और ड्यूटी पर न होने के कारण किसी मरीज की जांच या CGHS की ओर से मेडिकल और फिटनेस सर्टिफिकेट जारी करना संभव नहीं था।

इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि सर्टिफिकेट में जरूरी सीरियल नंबर नहीं थे, और प्रतिवादी अपनी लंबी गैरहाजिरी के दौरान बीमारी के दावे को साबित करने के लिए कोई मेडिकल रिकॉर्ड जैसे प्रिस्क्रिप्शन या ओपीडी स्लिप पेश नहीं कर सके।

हाईकोर्ट ने माना कि CAG ने गलती की

हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय कार्रवाई में किसी व्यक्ति को तभी दोषी ठहराया जा सकता है जब तथ्य दिखाते हों कि ऐसा होने की सबसे अधिक संभावना है, भले ही पूरा सबूत न हो। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोप क्रिमिनल जालसाजी का नहीं है, बल्कि बिना इजाजत छुट्टी लेने के लिए फर्जी सर्टिफिकेट जमा करना और झूठे बयान देना गंभीर मिसकंडक्ट है। इसे बेईमानी और भरोसे को तोड़ने वाला कार्य माना गया।

हाईकोर्ट ने 2 पुराने केसों का दिया हवाला

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि डिसिप्लिनरी अथॉरिटी का ऑर्डर CGHS वेरिफिकेशन और ठोस सबूतों पर आधारित था। कोर्ट ने नोट किया कि संबंधित डॉक्टर सर्टिफिकेट जारी करने की तारीखों पर छुट्टी पर थे, और इसलिए किसी मरीज की जांच या CGHS की ओर से मेडिकल और फिटनेस सर्टिफिकेट जारी करना संभव नहीं था। इसके अलावा सर्टिफिकेट में जरूरी सीरियल नंबर नहीं थे, और प्रतिवादी अपनी लंबी गैरहाजिरी के दौरान बीमारी के दावे को साबित करने के लिए कोई मेडिकल रिकॉर्ड पेश नहीं कर सके।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि कैट ने बिना किसी शक के सबूत पर क्रिमिनल स्टैंडर्ड लागू करके गलती की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोप क्रिमिनल जालसाजी का नहीं था, बल्कि बिना इजाजत छुट्टी लेने के लिए फर्जी सर्टिफिकेट जमा करना और झूठे बयान देना गंभीर मिसकंडक्ट है। इसे बेईमानी और भरोसे को तोड़ने वाला कार्य माना गया।

इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम राजेंद्र डी. हरमलकर – झूठे डॉक्यूमेंट्स दिखाना गलत काम है और मालिक का भरोसा कम करता है, जिससे नौकरी से निकालने की सजा दी जा सकती है। किरण ठाकुर बनाम रेजिडेंट कमिश्नर – नकली और बनावटी डॉक्यूमेंट जमा करने वाला व्यक्ति नौकरी के लायक नहीं माना जा सकता।

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