झारखंड हाई कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अगर बेटा और बहू अपने बुजुर्ग माता-पिता को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते हैं, तो वे माता-पिता की अर्जित संपत्ति में जबरन नहीं रह सकते। न्यायमूर्ति राजेश कुमार की अदालत ने इस मामले में रामगढ़ उपायुक्त के पूर्व आदेश को रद्द करते हुए बुजुर्ग दंपत्ति की याचिका को स्वीकार कर लिया है।
रामगढ़ जिले के निवासी लखन लाल पोद्दार (75 वर्ष) और उनकी पत्नी उमा रानी पोद्दार (72 वर्ष) ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। उनका आरोप था कि उनका बेटा जितेंद्र पोद्दार और बहू रितु पोद्दार उन्हें परेशान करते हैं और घर में शांतिपूर्वक रहने नहीं देते। बुजुर्ग दंपति ने वर्ष 2022 में मेंटेनेंस एक्ट के तहत एसडीएम के समक्ष आवेदन दिया था। 23 नवंबर 2022 को एसडीएम ने आदेश पारित करते हुए बेटे और बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया था।
इसके बाद बेटे-बहू ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामला अपील के लिए रामगढ़ के उपायुक्त के समक्ष भेजा गया, जहां 23 फरवरी 2024 को एसडीएम के आदेश में संशोधन करते हुए बेटे-बहू के पक्ष में फैसला दिया गया। इस आदेश को बुजुर्ग माता-पिता ने हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिस पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने उपायुक्त के आदेश को निरस्त कर दिया।
अगर साथ रहना संभव न हो और विवाद की स्थिति बनी रहे, तो मकान का कब्जा वरिष्ठ नागरिकों को ही सौंपा जाना चाहिए। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बुजुर्गों को सम्मान और सुरक्षा मिलना उनका मौलिक अधिकार है।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि कानून का प्राथमिक उद्देश्य बुजुर्गों को उनके जीवन के अंतिम पड़ाव में सुरक्षित और शांतिपूर्ण परिवेश प्रदान करना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बेटा-बहू का अधिकार केवल ‘उत्तराधिकार’ पर आधारित होता है, उसे ‘तत्काल स्वामित्व’ नहीं माना जा सकता।
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