दीपक सोहले, बुरहानपुर। आजादी के 78 साल बाद भी अगर बच्चे झोपड़ी में पढ़ने को मजबूर हों, न स्कूल हो, न सड़क, न शिक्षक- तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था की नाकामी है। मांडवा ग्राम पंचायत के बोमल्यापाट फाल्या में “पढ़ेगा इंडिया, बढ़ेगा इंडिया” जैसे नारे खोखले साबित हो रहे हैं।

झोपड़ी में स्थायी नहीं

आदिवासी अंचल का यह “मांडवा गांव” सरकारी फाइलों में भले “कवर्ड” हो, लेकिन जमीनी हकीकत शर्मसार कर देने वाली है। यहां न पक्का स्कूल भवन है, न नियमित शिक्षक, न सड़क, 60 बच्चे एक मजदूर की झोपड़ी में बैठकर पढ़ते हैं। वहीं मजदूर जो कभी पलायन कर चुका है, लेकिन वापसी के बाद क्या होगा ? यानी झोपड़ी भी स्थायी नहीं… और बच्चों का भविष्य भी नहीं…यहां कक्षा 9वीं की छात्रा सीमा बडोले खुद शिक्षिका बनकर नौनिहालों को पढ़ा रही हैं। उन्हें वन विभाग के एक नाकेदार कैलाश की ओर से 3000 प्रतिमाह दिए जाने का वादा किया है ताकि किसी तरह पढ़ाई चल सके।

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सरकारी मदद की मांग

सवाल यह है कि क्या एक आदिवासी बस्ती की शिक्षा अब “दान” पर चलेगी ? “धरती आभा” योजना”, “डिजिटल इंडिया” जैसे दावों के बीच बोमल्यापाट की सच्चाई सरकार के दावों पर करारा तमाचा है, जबकि इस क्षेत्र की विधायक भी आदिवासी, इसके बावजूद आदिवासी बच्चों को स्कूल भी नसीब नहीं हो रही है। केवल चुनाव के समय विधायक आती है लेकिन इस और ध्यान देने को तैयार नहीं। बच्चे कपड़े बिछाकर झोपड़ी में बैठते हैं, बरसात में कीचड़, गर्मी में तपती जमीन, यही उनका क्लासरूम है, छात्र राजेश-राहुल और शिक्षिका सीमा का कहना है यहां बच्चों के भविष्य की चिंता, संसाधनों की कमी और सरकारी मदद की मांग है। वहीं ग्राम के युवा जागरूक मास्टर रावत का भी कहना है कि शासन से तत्काल स्कूल भवन मिले और शिक्षक और सड़क की भी मांग की है।

78 साल बाद भी “सर्वे” बाकी

इस संबंध में नेपानगर के एसडीएम भागीरथ वाखला से बात की गई तो उन्होंने कहा कि “यदि धरती आभा योजना में गांव छूट गया है तो प्रस्ताव बनाकर भेजेंगे। शिक्षा विभाग से सर्वे कराएंगे।” यानी 78 साल बाद भी “सर्वे” बाकी है! आदिवासी विभाग के उपसंचालक भारत जांचपुरे ने भरोसा दिलाया कि “बच्चों का भविष्य बर्बाद नहीं होने देंगे, प्रस्ताव के लिये DPC को पत्र लिखकर भोपाल भेजा जाएगा।”

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सिस्टम को आईना

सवाल वही- कब तक ? अगले सत्र में ? या अगली पीढ़ी में ? आदिवासी विधायक, आदिवासी सरपंच, योजनाओं की लंबी सूची- फिर भी बच्चों को झोपड़ी में पढ़ना। क्यों ? क्या बोमल्यापाट के बच्चे सिर्फ आंकड़ों का हिस्सा हैं ? क्या इनके सपनों की कीमत 3000 महीना है ? अगर आज भी स्कूल और सड़क के लिए “प्रस्ताव” बनेंगे, तो फिर “नया भारत” किसके लिए बन रहा है ? यह रिपोर्ट सिर्फ खबर नहीं, सिस्टम को आईना है। अब देखना है कि शासन जागता है या बोमल्यापाट के बच्चे यूं ही झोपड़ी में भविष्य तलाशते रहेंगे।

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