दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि “समान काम के लिए समान वेतन” का सिद्धांत केवल पद या कार्य की समानता के आधार पर स्वतः लागू नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दो अलग-अलग कैडरों के कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता में अंतर है, तो उनके वेतन में अंतर को उचित ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि वेतन निर्धारण में शैक्षणिक योग्यता, चयन प्रक्रिया, अनुभव और जिम्मेदारियों जैसे कारक महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए केवल यह तर्क कि कर्मचारी समान कार्य कर रहे हैं, वेतन समान करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।

जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की बेंच ने अपने आदेश में कहा कि जब दो व्यक्तियों की शिक्षा का स्तर अलग होगा तो उनके ज्ञान, कौशल और क्षमता में भी अंतर होना तय है। अदालत ने कहा कि उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति अधिक जानकारी और विशेषज्ञता से संपन्न होता है, जबकि कम शिक्षा प्राप्त व्यक्ति का कार्यक्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित हो सकता है। ऐसे में अधिक योग्यता और ज्ञान रखने वाले कर्मचारी को अधिक वेतन देना अनुचित या भेदभावपूर्ण नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि “समान काम के लिए समान वेतन” का सिद्धांत हर परिस्थिति में समान रूप से लागू नहीं होता। यदि शैक्षणिक योग्यता, भर्ती प्रक्रिया या जिम्मेदारियों में अंतर है, तो वेतन में भिन्नता को उचित ठहराया जा सकता है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली मेडिकल टेक्निकल एम्प्लॉइज एसोसिएशन की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल पदनाम या काम की प्रकृति समान होने के आधार पर वेतन समानता का दावा नहीं किया जा सकता। अदालत ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों को अधिक वेतन मिलने के पक्ष को भी सही ठहराया। बेंच ने अपने फैसले में बिहार राज्य बनाम बिहार माध्यमिक शिक्षक संघर्ष समिति मामला का हवाला देते हुए कहा कि यदि इन कारकों में अंतर है, तो वेतन में भिन्नता को भेदभाव नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों की शिक्षा, चयन प्रक्रिया और सेवा शर्तों में स्पष्ट अंतर है, इसलिए दोनों के वेतन की तुलना उचित नहीं है।

जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की बेंच ने पाया कि दिल्ली नगर निगम में लैब टेक्नीशियन पद के लिए न्यूनतम योग्यता केवल मैट्रिक (10वीं) निर्धारित है, जबकि केंद्र सरकार के तहत इसी पद पर नियुक्ति के लिए बीएससी डिग्री अनिवार्य है। अदालत ने माना कि जब भर्ती के लिए आवश्यक शिक्षा स्तर में इतना स्पष्ट अंतर है, तो दोनों श्रेणियों के कर्मचारियों को समान वेतन देने की मांग उचित नहीं ठहराई जा सकती। बेंच ने कहा कि शैक्षणिक योग्यता के आधार पर वर्गीकरण न केवल वैध है, बल्कि प्रशासनिक दृष्टि से भी तर्कसंगत माना जाता है।

केन्द्र व राज्य सरकार के वेतन को दी गई थी चुनौती

दिल्ली हाईकोर्ट में दिल्ली मेडिकल टेक्निकल एम्प्लॉइज एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका में मांग की गई थी कि दिल्ली नगर निगम के अस्पतालों में कार्यरत लैब टेक्नीशियनों को केंद्र सरकार के संस्थानों जैसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनआईसीडी) के लैब टेक्नीशियनों के समान वेतन दिया जाए। याचिका में तर्क दिया गया था कि दोनों जगह पद का नाम और कार्य की प्रकृति समान है, इसलिए एमसीडी के लैब टेक्नीशियनों को भी पांचवें वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार वेतनमान मिलना चाहिए।

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