अभय मिश्रा, मऊगंज। मध्य प्रदेश के नवगठित जिले मऊगंज में इन दिनों सियासत की हवाएं काफी गर्म हैं। मामला किसी विकास कार्य का नहीं, बल्कि ‘विरोध की आवाज’ को कुचलने के आरोपों का है। गांधीवादी तरीके से अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले 70 वर्षीय मुद्रिका प्रसाद त्रिपाठी और उनके बुजुर्ग सहयोगियों को धारा 151 के तहत जेल में ठूंसा गया है। अब खबर है कि मुद्रिका प्रसाद ने जेल के भीतर अन्न का त्याग कर दिया है, जिससे प्रशासन के हाथ-पांव फूलने लगे हैं।

क्या है पूरा विवाद ?

इस पूरे घटनाक्रम की पटकथा 16 दिसंबर 2025 से लिखी जानी शुरू हुई थी, जब पहली बार मुद्रिका प्रसाद त्रिपाठी समेत 8 लोगों को प्रदर्शन के दौरान जेल भेजा गया। विवाद की ताजा कड़ी 24 फरवरी 2026 की है। जब देवतालाब से बीजेपी विधायक गिरीश गौतम के कथित प्रतिनिधि इंद्रपाल सिंह (जो नाबालिग से बलात्कार का आरोपी है) की गिरफ्तारी की मांग को लेकर मुद्रिका प्रसाद त्रिपाठी, रामेश्वर गुप्ता (78), देवेंद्र मिश्रा (60) और भगवानदीन शुक्ला (60) काली पट्टी बांधकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। पुलिस ने इन्हें हिरासत में लिया और धारा 151 (शांति भंग की आशंका) के तहत जेल भेज दिया। हालांकि एक दिन पूर्व कथित विधायक प्रतिनिधि इंद्रपाल सिंह ने न्यायालय में आत्म समर्पण कर दिया था।

जेल में अन्न त्याग: आस्था और आक्रोश का संगम

मुद्रिका प्रसाद त्रिपाठी के अधिवक्ता पंकज मिश्रा के अनुसार, त्रिपाठी जी ‘गौ-भक्त’ हैं और बिना गौ-दर्शन के अन्न ग्रहण नहीं करते। जेल की सलाखों के पीछे यह संभव नहीं है, लिहाजा उन्होंने अन्न का त्याग कर दिया है। 78 वर्ष की आयु में रामेश्वर गुप्ता जैसे बुजुर्गों को होली जैसे त्योहार पर भी जमानत न मिलना, मऊगंज की गलियों में चर्चा और प्रशासन के प्रति नाराजगी का विषय बना हुआ है।

दोहरा मापदंड: सत्ता पक्ष को छूट-विपक्ष पर ‘बूट’?

मऊगंज की जनता और राजनीतिक पंडित अब प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं। सवाल वाजिब भी हैं कि 24 फरवरी को प्रशासन का समानता का अधिकार कहा गया था जिस दिन मुद्रिका प्रसाद को शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए गिरफ्तार किया गया, उसी दिन सत्ता पक्ष (विधायक पुत्र राहुल गौतम और भाजपा जिलाध्यक्ष राजेंद्र मिश्रा) ने भी कलेक्ट्रेट के सामने भारी भीड़ के साथ प्रदर्शन किया। क्या उस दिन धारा 163 (पूर्व में 144) लागू नहीं थी ? यदि थी, तो सत्ता पक्ष के सैकड़ों लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई ? क्योंकि पिछले एक महीने में कई प्रदर्शन हुए जिसमें विधायक प्रदीप पटेल का बाबा ढाबा प्रदर्शन हो या पूर्व विधायक सुखेंद्र सिंह बन्ना का हनुमना या मऊगंज कलेक्टर कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन हो- पर प्रशासन ने किसी पर हाथ नहीं डाला। फिर सिर्फ इन बुजुर्गों पर ही ‘दमनकारी’ नीति क्यों?

भ्रष्टाचार-अपराधियों को बचाने की सोची-समझी रणनीति ?

क्या मऊगंज में भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना गुनाह है ? क्या लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार सिर्फ रसूखदारों को है? यह सवाल अब आम जनता के बीच गूंज रहा है। हैरानी की बात यह है कि मुद्रिका प्रसाद का विरोध एक ‘बलात्कार के आरोपी’ की गिरफ्तारी को लेकर था। ऐसे में सत्ता पक्ष की ओर से उनके खिलाफ प्रदर्शन करना समझ से परे है। क्या यह भ्रष्टाचार और अपराधियों को बचाने की कोई सोची-समझी रणनीति है?

उठे कई सवाल

19 दिसंबर को कड़कड़ाती ठंड में नग्न प्रदर्शन के बाद से शुरू हुआ यह संघर्ष अब जेल की सलाखों के भीतर ‘भूख हड़ताल’ तक पहुंच गया है। अब प्रशासन की साख दांव पर लगी है कि एक मामूली जमानती धारा (151) में बुजुर्गों को लंबे समय तक जेल में रखना और उनकी जमानत याचिका पर टालमटोल करना, प्रशासन की कार्यप्रणाली को संदेह के घेरे में खड़ा करता है। मुद्रिका प्रसाद त्रिपाठी की जिद और बिगड़ता स्वास्थ्य आने वाले दिनों में मऊगंज पुलिस और जिला प्रशासन के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है।

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