राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में एक 51 वर्षीय व्यक्ति ने दिल्ली पुलिस के 10 से अधिक जवानों पर उसकी 13 वर्षीय बेटी को जबरन ले जाने का आरोप लगाया है। शख्स का दावा है कि मंगलवार को हुई यह कार्रवाई कानून का स्पष्ट उल्लंघन है और बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामले में फैमिली कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों का भी खुला उल्लंघन किया गया है। दरअसल, यह मामला पति-पत्नी के बीच चल रहे पारिवारिक विवाद से जुड़ा है। हाल ही में फैमिली कोर्ट ने बच्ची की कस्टडी उसकी मां को सौंपने का आदेश दिया था। पिता का आरोप है कि अदालत के आदेश को लागू करने के दौरान पुलिस ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया और बच्ची को जबरन अपने साथ ले गई। उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी बेटी की मौजूदा लोकेशन और उसकी सेहत को लेकर गंभीर चिंता है। उनका कहना है कि उन्हें अब तक बच्ची से संपर्क करने की अनुमति नहीं दी गई है।

51 वर्षीय पिता ने दावा किया है कि बाल कल्याण समिति (CWC) के आदेश के बाद उनकी बेटी पिछले तीन साल से उनके साथ रह रही थी। पिता का कहना है कि POCSO कोर्ट और CWC के मौजूदा आदेशों के बावजूद, पिछले सप्ताह एक फैमिली कोर्ट ने बच्ची की कस्टडी उसकी मां को सौंप दी। उनका आरोप है कि इस आदेश को लागू करते समय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और बच्ची को जबरन ले जाया गया। उन्होंने अपनी बेटी की मौजूदा लोकेशन और उसकी सेहत को लेकर गंभीर चिंता जताई है। इस मामले में दिल्ली पुलिस के नॉर्थ-वेस्ट जिले के DCP भीष्म सिंह की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। हालांकि पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि मामले की जांच की जा रही है।

मेरा फोन छीनकर बेटी को जबरन ले गए

उनके मुताबिक, “दोपहर करीब 2:30 बजे जब मैं अपनी बेटी के साथ एक मार्केट में था, तभी करीब 10 लोग वहां पहुंचे। इनमें से कुछ सादे कपड़ों में थे। उन्होंने मुझ पर हमला किया। ताकि मैं किसी से मदद न मांग सकूं, मेरा फोन छीन लिया गया और मुझे जबरदस्ती एक कार में डाल दिया गया।” पिता का दावा है कि यह कार्रवाई कानून के खिलाफ है और कस्टडी से जुड़े मामले में अदालत के आदेशों की अनदेखी की गई। यह मामला पहले से चल रहे पारिवारिक विवाद से जुड़ा है, जिसमें हाल ही में फैमिली कोर्ट ने बच्ची की कस्टडी उसकी मां को देने का आदेश दिया था।

बच्ची को ले जाने के बाद चिल्ड्रन्स होम भेज दिया

उनका दावा है, “वे बच्ची को जबरदस्ती CWC-वेस्ट ऑफिस ले गए, जहां उसे करीब एक घंटे तक एक बंद कमरे में रखा गया। इसके बाद, बच्ची की मर्जी नहीं होने के बावजूद उसे एक चिल्ड्रन्स होम भेज दिया गया और इस बारे में मुझे कोई भी जानकारी नहीं दी गई।” यह मामला पहले से चल रहे कस्टडी विवाद से जुड़ा है, जिसमें हाल ही में फैमिली कोर्ट ने बच्ची की कस्टडी उसकी मां को सौंपने का आदेश दिया था। पिता का कहना है कि पूर्व में CWC और POCSO कोर्ट के आदेशों के तहत बच्ची उनके साथ रह रही थी।

अब तक सिर्फ आश्वासन मिला, नहीं मिली कोई मदद

पिता ने आरोप लगाया है कि कथित जबरन कार्रवाई के बाद उन्होंने औपचारिक शिकायत दर्ज कराई, लेकिन अब तक उन्हें कोई ठोस मदद नहीं मिली। उन्होंने कहा, “मैंने पुलिस हेल्पलाइन 112 पर कॉल कर पुलिस की ज़्यादती की शिकायत दर्ज कराई। मुझे भरोसा दिया गया कि मामले पर गौर किया जाएगा। इसके अलावा मैंने चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 पर भी संपर्क किया, लेकिन अभी तक कहीं से कोई मदद नहीं मिली।”

पुलिस सुरक्षा में थी बच्ची

पिता का दावा है कि उनकी बेटी ने अपनी मां के साथ रहने वाले एक पारिवारिक सदस्य के खिलाफ Protection of Children from Sexual Offences Act (POCSO) के तहत मामला दर्ज कराया था। इसी वजह से उसे पुलिस सुरक्षा में पिता की देखरेख में रखा गया था। पिता के मुताबिक, हालिया फैमिली कोर्ट के आदेश में कहा गया था कि मां, बाल कल्याण समिति (CWC) से एक महिला पुलिस अधिकारी और एक चाइल्ड काउंसलर की उपस्थिति में बच्चे को सुरक्षित वापस लाने का अनुरोध कर सकती है। आदेश में CWC को स्थानीय SHO से सहायता लेने की भी अनुमति दी गई थी। पिता का आरोप है कि इस निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ HC पहुंची बच्ची

आगे उन्होंने कहा कि CWC को जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत काम करना चाहिए और वह बच्चे की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 13 वर्षीय बच्ची की कस्टडी को लेकर विवाद अब न्यायिक प्रक्रिया के केंद्र में आ गया है। पिता का कहना है कि बच्चे की मर्जी के खिलाफ जबरदस्ती या दबाव का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और न ही उसके सर्वोत्तम हितों की अनदेखी की जा सकती है।पिता के मुताबिक, उनकी बेटी ने दिल्ली हाई कोर्ट में फैमिली कोर्ट के कस्टडी आदेश को चुनौती दी है। याचिका में दलील दी गई है कि फैमिली कोर्ट के पास एक POCSO पीड़िता के संबंध में ऐसा आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है।

उन्होंने बताया, “मेरी बेटी ने जबरदस्ती की गई इस कार्रवाई के खिलाफ सुरक्षा के लिए याचिका दायर की थी। 25 फरवरी को दलीलें आंशिक रूप से सुनी गईं और मामला 2 मार्च के लिए सूचीबद्ध था। लेकिन 27 फरवरी को नोटिफिकेशन जारी हुआ कि कोर्ट इस हफ्ते बंद रहेंगे। इसके बावजूद CWC और पुलिस ने हाई कोर्ट के दोबारा खुलने का इंतजार नहीं किया और मंगलवार को कार्रवाई कर दी।”

पिता का आरोप है कि इस कार्रवाई में न तो लंबित याचिका का संज्ञान लिया गया और न ही न्यायिक प्रक्रिया का इंतजार किया गया। इस मामले में बाल कल्याण समिति (CWC) और दिल्ली पुलिस की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पुलिस की ओर से कहा गया है कि पूरे घटनाक्रम की जांच की जा रही है।

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