हेमंत शर्मा, इंदौर। इंदौर के चर्चित भागीरथपुरा दूषित पानी कांड को लेकर गुरुवार को हाईकोर्ट में हुई सुनवाई में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। सुनवाई के दौरान नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे। अदालत ने पाया कि निगम ने अब तक कई जरूरी रिकॉर्ड जांच समिति के सामने पेश ही नहीं किए हैं। इस पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए नगर निगम को 10 दिनों के भीतर सभी जरूरी दस्तावेज जांच समिति को सौंपने के निर्देश दिए हैं।
पानी में दवा जैसी गंध की शिकायत
सुनवाई के दौरान वकीलों ने कोर्ट को बताया कि भागीरथपुरा इलाके के लोगों ने नलों से आने वाले पानी में दवा जैसी तेज गंध होने की शिकायत की थी। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि पानी का रंग भी गंदा था। ऐसे कई लोग, जिन्होंने यह पानी पिया, अचानक बीमार पड़ गए। लोगों की बातचीत और बयान रिकॉर्ड कर पेन ड्राइव में सुरक्षित रखे गए हैं, जिन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा।
टैंक में पोटेशियम क्लोराइड डालने का दावा
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया ने कोर्ट में दावा किया कि भागीरथपुरा के वार्ड नंबर 11 के ओवरहेड टैंक में पोटेशियम क्लोराइड (KCl) की टैबलेट डाली गई थीं। याचिका में कहा गया है कि पोटेशियम क्लोराइड पीने के पानी को शुद्ध करने के लिए स्वीकृत केमिकल नहीं है। यह न तो क्लोरीनेशन एजेंट है और न ही कोई जर्मीसाइडल पदार्थ। अगर टैंक में यह टैबलेट डाली गई हैं, तो इसे नगर निगम की जल आपूर्ति व्यवस्था में अनधिकृत हस्तक्षेप माना जाएगा, जो लोगों की सेहत के लिए बेहद खतरनाक है।
खरीद प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि ये टैबलेट नगर निगम की आधिकारिक खरीद प्रक्रिया के तहत नहीं ली गई थीं, बल्कि एक निजी दुकान से खरीदी गई थीं। इसके बाद मौखिक निर्देशों के आधार पर इन्हें टैंक में डाल दिया गया। इस पूरे मामले में निष्पक्ष पुलिस जांच की मांग भी कोर्ट में की गई है।
टैंक की देखरेख में पांच लोग जिम्मेदार
कोर्ट को बताया गया कि जिस ओवरहेड टैंक से भागीरथपुरा इलाके में पानी सप्लाई होता है, उसकी देखरेख के लिए पांच लोग जिम्मेदार हैं। इनमें तीन कर्मचारी नगर निगम के हैं, जबकि दो कर्मचारी निजी कंपनी रामकी इंडस्ट्रीज से जुड़े बताए गए हैं। इन सभी की भूमिका की जांच की जा रही है।
तीन स्रोतों से होती है शहर में पानी की सप्लाई
सुनवाई के दौरान यह भी जानकारी दी गई कि इंदौर शहर में पेयजल की आपूर्ति मुख्य रूप से नर्मदा जल योजना, यशवंत सागर बांध और बिलावली तालाब से होती है। इन स्रोतों से आने वाले पानी को जल शोधन केंद्रों में शुद्ध करने के बाद शहर के करीब 108 से 110 ओवरहेड टैंकों तक भेजा जाता है, जहां से पाइपलाइन के जरिए अलग-अलग इलाकों में पानी की सप्लाई होती है।
आखिरी टैंक में मिला दूषित पानी
कोर्ट में बताया गया कि जलदू से आने वाली लाइन में तीसरे आखिरी टैंक तक पानी पूरी तरह साफ और मानक के अनुरूप पाया गया। लेकिन उसी लाइन के दूसरे आखिरी और आखिरी टैंक, जहां से भागीरथपुरा इलाके में पानी सप्लाई होता है, वहां पानी दूषित पाया गया। इससे संदेह और गहरा गया है कि पानी में गड़बड़ी टैंक स्तर पर ही हुई।
पहले भी हाईकोर्ट जता चुका है नाराजगी
इससे पहले हुई सुनवाई में हाईकोर्ट शासन और नगर निगम की रिपोर्ट को ‘आई वॉश’ बताते हुए सख्त नाराजगी जता चुका है। अदालत ने कहा था कि यह मामला सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी आपात स्थिति है और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है।
जांच आयोग को 30 दिन का समय
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एकल सदस्यीय जांच आयोग गठित किया है। आयोग ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट अदालत में पेश कर दी है। कोर्ट ने आयोग को 30 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। अब इस मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को होगी।
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