दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट (Patiala House Court) ने जबरन वसूली से जुड़े करीब 15 वर्ष पुराने एक मामले में अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को डरा-धमकाकर उससे एक रुपये भी लिया जाता है, तो वह कानून की नजर में उगाही (Extortion) का अपराध माना जाएगा। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट Ankit Garg की अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी व्यक्ति को चोट, नुकसान या किसी अन्य प्रकार के डर का हवाला देकर उससे पैसे या संपत्ति हासिल की जाती है, तो यह जबरन वसूली की श्रेणी में आता है। इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि वसूली गई पूरी रकम का सटीक मिलान हो या पूरी राशि बरामद की जाए। अदालत ने कहा कि यदि यह साबित हो जाता है कि आरोपी ने डर दिखाकर किसी से पैसे या संपत्ति हासिल की है, तो वही अपने आप में उगाही का अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है।

मयंक मिश्रा और संजीव कुमार को दोषी ठहराया

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट Ankit Garg की अदालत ने कहा कि इस अपराध की गंभीरता को साबित करने के लिए सबसे अहम और मूल प्रश्न यह है कि क्या पैसे का लेन-देन आरोपी द्वारा पैदा किए गए खौफ की वजह से हुआ था। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़ित की गवाही इस बात पर अडिग रहती है कि उसने डर के कारण पैसे दिए, तो आरोपी को दोषी ठहराने के लिए यह पर्याप्त आधार हो सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि जबरन वसूली के मामलों में वसूली गई राशि का सटीक मिलान या पूरी रकम की बरामदगी अनिवार्य शर्त नहीं होती। महत्वपूर्ण यह है कि आरोपी ने डर या धमकी का माहौल बनाकर पैसे या संपत्ति हासिल की या नहीं।

फर्जी स्टिंग से बनाया दबाव

यह मामला दिसंबर 2011 में Naraina थाना क्षेत्र का है। यहां “मेरा मेडिकोज” नाम से मेडिकल स्टोर चलाने वाले संदीप तंवर को कथित रूप से एक सोची-समझी साजिश के तहत निशाना बनाया गया था। अभियोजन के अनुसार, मामले के मुख्य आरोपी मयंक मिश्रा पहले ग्राहक बनकर दुकान पर पहुंचे और वहां से दवा खरीदी। इसके बाद वह दुकान में की गई रिकॉर्डिंग वाली एक कथित स्टिंग सीडी लेकर वापस आए। उन्होंने दावा किया कि उनके पास बिना पर्चे के दवा बेचने के सबूत हैं और इसी आधार पर दुकानदार को डराना शुरू कर दिया।

बताया गया कि मयंक के साथ मौजूद दूसरे आरोपी संजीव कुमार ने खुद को प्रभावशाली व्यक्ति बताते हुए पीड़ित को धमकी दी कि अगर पांच लाख रुपये नहीं दिए गए तो वे दुकान का लाइसेंस रद्द कराकर उसे सड़क पर ला देंगे। सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद अदालत ने मयंक मिश्रा और संजीव कुमार को दोषी ठहराया, जबकि साक्ष्यों के अभाव में अर्चना को बरी कर दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जबरन वसूली के मामलों में वसूली गई पूरी रकम की बरामदगी जरूरी नहीं होती, बल्कि यह साबित होना महत्वपूर्ण है कि पैसे डर या धमकी के कारण लिए गए थे।

बचाव पक्ष की दलीलें खारिज

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि मामला करीब 15 साल पुराना है और गवाहों को घटनाओं की सटीक तारीखें याद नहीं हैं। साथ ही मौके पर कोई स्वतंत्र गवाह भी मौजूद नहीं था। हालांकि अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद गवाह की याददाश्त में मामूली चूक होना स्वाभाविक है और इससे गवाही की विश्वसनीयता कम नहीं होती।

दुकान बंद करवाने की धमकी दी गई थी

शिकायतकर्ता के अनुसार, इसके बाद उसे फोन कॉल भी आए, जिनमें खुद को ममता बताने वाली महिला ने पैसे नहीं देने पर दुकान बंद करवाने की धमकी दी। लगातार दबाव और धमकियों के बीच आरोपियों ने उससे 10 हजार रुपये ले लिए और बाकी रकम लेने के लिए फिर आने की बात कही। इस बीच पीड़ित ने पुलिस को सूचना दे दी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने जाल बिछाया और जब आरोपी दोबारा पैसे लेने दुकान पर पहुंचे तो उन्हें मौके से ही पकड़ लिया गया।

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