गोविंद पटेल, कुशीनगर. जनपद के खड्डा तहसील क्षेत्र स्थित भैसहा घाट पर बड़ी गंडक नदी पर बना पीपा पुल इन दिनों लोगों के लिए राहत नहीं, बल्कि खतरे का कारण बन गया है. सरकार जहां विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि बदहवास सिस्टम को किसी की मौत का इंतजार है क्या?

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बता दें कि भैसहा घाट का यह पीपा पुल हर वर्ष बनाया जाता है, जिसका उद्देश्य रेतावासियों और आसपास के ग्रामीणों को लंबी दूरी से राहत देना है. दावा किया जाता है कि इस पुल के बन जाने से लोगों को करीब 40 किलोमीटर का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा और मात्र 10 किलोमीटर में खड्डा तक पहुंचा जा सकेगा, लेकिन इस बार भी पुल का निर्माण अधूरा छोड़ दिया गया है. स्थिति यह है कि पुल के बीच में पीपा लगाए बिना ही काम रोक दिया गया, जिससे रास्ता पूरी तरह असुरक्षित बना हुआ है. इसके बावजूद स्थानीय लोग मजबूरी में इसी अधूरे पुल से आवागमन कर रहे हैं. मोटरसाइकिल, पैदल यात्री और यहां तक कि चार पहिया वाहन भी जान जोखिम में डालकर पुल पार कर रहे हैं. ऐसे में कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है.

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ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या नई नहीं है. पिछले पांच वर्षों से हर साल यही स्थिति दोहराई जा रही है. पुल का निर्माण अधूरा रहता है और जैसे ही नदी का जलस्तर बढ़ता है, उसे खोल दिया जाता है. इसके बाद अगले वर्ष फिर निर्माण के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च दिखाए जाते हैं. स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि पीपा पुल अब जिम्मेदार विभागों के लिए “सोने का अंडा देने वाली मुर्गी” बन गया है, जहां हर साल बजट तो खर्च होता है, लेकिन सुविधा धरातल पर नहीं दिखती.

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कब तक कागज में दौड़ेगा विकास?

हैरानी की बात यह है कि जब इस संबंध में विभागीय अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई तो न तो संबंधित इंजीनियर उपलब्ध हुए और न ही उच्च अधिकारी. इससे साफ जाहिर होता है कि जिम्मेदार विभाग इस गंभीर समस्या को लेकर कितने संवेदनशील हैं. अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक लोग अपनी जान जोखिम में डालकर इस अधूरे पुल से गुजरते रहेंगे. क्या कभी यह पुल पूरी तरह बन पाएगा या फिर हर साल इसी तरह अधूरा निर्माण और कागजी विकास का खेल चलता रहेगा.