जगदलपुर। बस्तर में रोजी-रोटी की जद्दोजहद ने एक और जान ले ली, जहां सिटी कोतवाली क्षेत्र के बनियागांव में रेत निकालते वक्त किसान की दर्दनाक मौत हो गई। मंगलवार को बल्लारी नाला में हाथ से रेत निकालने के दौरान अचानक धंसान हुआ और किसान गहरे गड्ढे में समा गया। देखते ही देखते मौके पर चीख-पुकार मच गई। ग्रामीणों ने तत्काल मदद की गुहार लगाई प्रशासन और ग्रामीणों की टीम मौके पर पहुंची, लेकिन रेत की गहराई ने राहत कार्य को बेहद मुश्किल बना दिया। करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद जेसीबी की मदद से शव बाहर निकाला गया। मृतक की पहचान सुखराम पोयाम 37 निवासी मांझीपारा बनियागांव के रूप में हुई। बताया जा रहा है कि वह गौठान के पीछे नाले से रेत निकाल रहा था तभी हादसा हुआ। घटना ने असुरक्षित खनन की सच्चाई उजागर कर दी। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। पुलिस पूरे मामले की जांच में जुटी है। अब सवाल यही है कि आखिर कब तक पेट की आग बुझाने के लिए लोग जान जोखिम में डालते रहेंगे।

सिस्टम पर नोटों की चोट, आरटीओ घेराव में फूटा गुस्सा

जगदलपुर। बस्तर में सड़क सुरक्षा और भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा विरोध प्रदर्शन देखने को मिला, जहां युवा कांग्रेस ने आरटीओ कार्यालय का घेराव किया। प्रदर्शन के दौरान नेताओं ने नोटों से भरा बैग अधिकारियों के सामने रखकर सीधे सिस्टम को कटघरे में खड़ा किया। लोकसभा समन्वयक आदित्य सिंह बिसेन ने पूछा कि आखिर जनता की जान की कीमत कितनी है? उन्होंने आरोप लगाया कि लाइसेंस से लेकर फिटनेस तक हर जगह दलाली का खेल चल रहा है। प्रदर्शन के जरिए अधिकारियों की अंतरात्मा जगाने की कोशिश की गई। पूर्व विधायक रेखचंद जैन ने कहा कि सड़कें बस माफियाओं के लिए मुनाफे का जरिया बन गई हैं और आम जनता के लिए खतरा बन चुकी हैं पुरानी गाड़ियों पर टैक्स के नाम पर जनता की जेब काटने का आरोप भी लगाया गया। जीपीएस के नाम पर हजारों रुपए वसूली और मॉनिटरिंग सिस्टम की कमी पर सवाल उठे।प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा कि अब जनता की सुरक्षा से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं होगा। 80 किमी स्पीड लॉक बसों की अनिवार्यता की मांग भी उठाई गई। चेतावनी दी गई कि अगर जल्द सुधार नहीं हुआ तो आंदोलन सड़क से सदन तक पहुंचेगा।

बस स्टैंड से अंतर्राज्यीय तस्करी का भंडाफोड़, 5 लाख का गांजा जब्त

जगदलपुर। बस्तर पुलिस ने नशे के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए अंतर्राज्यीय तस्करों को पकड़ने में सफलता हासिल की। बोधघाट थाना पुलिस ने नए बस स्टैंड के पीछे से दो संदिग्धों को दबोचा जो बस का इंतजार कर रहे थे। आरोपियों के पास से 10.36 किलो गांजा बरामद किया गया, जिसकी कीमत करीब 5 लाख 18 हजार रुपए बताई जा रही है। मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने घेराबंदी कर यह कार्रवाई की। पुलिस को देखते ही आरोपी भागने लगे, लेकिन पकड़ लिए गए। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान दिल्ली और राजस्थान के रहने वालों के रूप में हुई। तलाशी के दौरान बैग से टेप में लिपटे गांजे के पैकेट बरामद हुए। वैध दस्तावेज नहीं मिलने पर एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया। दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया, जहां से जेल भेज दिया गया। यह कार्रवाई पुलिस के नशा विरोधी अभियान का हिस्सा है। पुलिस का कहना है कि बस्तर को नशा मुक्त बनाने के लिए अभियान लगातार जारी रहेगा।

करोड़ों खर्च के बाद भी बंद पड़ा रीपा, ताले में कैद विकास

जगदलपुर। बस्तर में विकास योजनाओं की जमीनी हकीकत फिर सवालों में है, जहां धुरागांव का ग्रामीण औद्योगिक पार्क बंद पड़ा है। करोड़ों रुपए खर्च कर बनाए गए इस रीपा में आज सन्नाटा पसरा हुआ है। भवन और मशीनें तैयार हैं लेकिन काम शुरू नहीं हो पाया। सरकार बदलने के बाद योजना ठंडे बस्ते में चली गई। स्थिति यह है कि मुख्य गेट खुला है और सुरक्षा व्यवस्था नाम मात्र की है। खिड़कियों से दिख रहे उपकरणों की चोरी का खतरा भी बना हुआ ह। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर यह शुरू होता तो रोजगार के अवसर मिलते। यह योजना कभी महत्वाकांक्षी बताई गई थी, लेकिन अब सफेद हाथी बन गई है। ग्रामीणों में भारी नाराजगी है कि संसाधनों का उपयोग नहीं हो रहा प्रशासन की निष्क्रियता से सरकारी धन की बर्बादी साफ नजर आ रही है। अब सवाल यह है कि क्या इस योजना को फिर से शुरू किया जाएगा या यूं ही बंद पड़ी रहेगी?

गैस संकट से चरमराई जिंदगी, होटल से घर तक हाहाकार

किरंदुल। लौह नगरी में गैस सिलेंडर की भारी किल्लत ने जनजीवन को प्रभावित कर दिया है। एनएमडीसी क्षेत्र होने के कारण यहां हजारों लोग होटल और ढाबों पर निर्भर हैं लेकिन कमर्शियल गैस की कमी ने पूरी व्यवस्था को बिगाड़ दिया है। जानकारी के अनुसार आपूर्ति सीमित कर दी गई है और प्राथमिकता केवल अस्पताल को दी जा रही है। होटल संचालकों के सामने कारोबार बंद करने की नौबत आ गई है। छोटे व्यापारी और ठेला संचालक भी संकट में हैं, घरेलू उपभोक्ताओं को भी कई दिनों तक सिलेंडर नहीं मिल रहा। एजेंसियां नियमों का हवाला देकर जिम्मेदारी से बच रही हैं। लोगों का कहना है कि यह मूलभूत सुविधा का गंभीर संकट है, स्थिति नहीं सुधरी तो भोजन का संकट गहराएगा। व्यापारियों और नागरिकों ने प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है, अब देखना होगा कि कब तक राहत मिलती है।

अबूझमाड़ में बदली तस्वीर, कुमनार कैम्प से टूटा नक्सल गढ़

नारायणपुर। अबूझमाड़ जैसे दुर्गम इलाके में सुरक्षा और विकास की नई शुरुआत हुई है, जहां कुमनार में नया सुरक्षा कैम्प स्थापित किया गया है। यह 2026 का आठवां और अंतिम कैम्प माना जा रहा है। दशकों से नक्सल प्रभाव वाले क्षेत्र में अब बदलाव नजर आने लगा है, कैम्प खुलने से सड़क स्वास्थ्य शिक्षा और नेटवर्क जैसी सुविधाएं तेजी से पहुंचेंगी। कुमनार क्षेत्र पहले माओवादियों का मजबूत गढ़ माना जाता था, अब यहां सुरक्षा बलों की स्थायी मौजूदगी से हालात बदल रहे हैं। नारायणपुर से भैरमगढ़ तक सड़क कनेक्टिविटी भी सुनिश्चित की गई है, इससे आवागमन आसान होगा और विकास को गति मिलेगी। पुलिस डीआरजी बस्तर फाइटर्स और आईटीबीपी की संयुक्त भूमिका रही है। माड़ बचाव अभियान के तहत लगातार नए कैम्प खोले जा रहे हैं, इसका उद्देश्य सुरक्षा के साथ विकास को अंतिम गांव तक पहुंचाना है।

सतर्क पुलिस की पहल, 3 साल का मासूम सुरक्षित परिवार तक पहुंचा

बस्तर। जगदलपुर में पुलिस की तत्परता से एक मासूम बच्चे को सुरक्षित उसके परिवार से मिलाया गया। पेट्रोल पंप के पास रोता हुआ तीन साल का बच्चा मिला, जिसकी सूचना लोगों ने पुलिस को दी। पुलिस ने तुरंत मौके पर पहुंचकर बच्चे को अपनी अभिरक्षा में लिया। बच्चा डरा हुआ था और कुछ भी बता नहीं पा रहा था। पुलिस ने आसपास के क्षेत्रों में जांच शुरू की पूछताछ के दौरान बच्चे की पहचान रोशन इस्तम के रूप में हुई जो दशरथ पारा का रहने वाला है। पुलिस ने बच्चे को सुरक्षित परिजनों को सौंप दिया। बच्चे को सकुशल देखकर परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। परिजनों ने पुलिस का आभार जताया। इस कार्रवाई में पुलिस की संवेदनशीलता और तत्परता साफ नजर आई। समय पर कार्रवाई से एक बड़ी अनहोनी टल गई।

टाइगर रिजर्व में बसे गांव, खतरे और हकीकत के बीच जंग

बीजापुर। बीजापुर में इंद्रावती टाइगर रिजर्व के भीतर बसे गांव अब बड़ी चुनौती बने हुए हैं। करीब 2799 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वाले इस रिजर्व में बड़ा हिस्सा बफर जोन का है। नियमों के अनुसार यहां मानव बसाहट नहीं होनी चाहिए, लेकिन वर्षों से गांव बसे हुए हैं और लोग जंगल पर निर्भर हैं। सरकार द्वारा विस्थापन के प्रयास लगातार विफल रहे हैं। ग्रामीण अपनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर बाघों की मौजूदगी का दावा किया जाता है और कैमरों में कई बार बाघ कैद भी हुए हैं। ऐसे में मानव और वन्यजीव संघर्ष का खतरा बना रहता है। हाईकोर्ट में मामला जाने के बाद कई फैसलों पर रोक लगी है। वन विभाग संरक्षण पर करोड़ों खर्च कर रहा है लेकिन जमीनी स्थिति जस की तस है। अब बड़ा सवाल यही है कि संरक्षण और विस्थापन के बीच संतुलन कैसे बनेगा।