जगदलपुर। बस्तर संभाग में 1 अप्रैल 2026 अब केवल एक तारीख नहीं बल्कि परिवर्तन की प्रतीक बन चुकी है, जहां 31 दिनों के भीतर चलाए गए मिशन 2026 ने दशकों से जमे माओवादी ढांचे को जड़ से हिलाकर रख दिया है, इस अभियान में डीआरजी, एसटीएफ, कोबरा और बस्तर फाइटर्स की संयुक्त रणनीति ने यह साबित कर दिया कि अब लड़ाई केवल बंदूक की नहीं बल्कि विश्वास और पुनर्वास की है.

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आईजी सुंदरराज पी के नेतृत्व में सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के सैन्य ही नहीं बल्कि आर्थिक नेटवर्क पर भी निर्णायक प्रहार किया, एक महीने में 170 आत्मसमर्पण और 27 महीनों में 2700 से ज्यादा कैडरों की वापसी इस बात का संकेत है कि जंगलों में अब डर नहीं बल्कि भरोसा लौट रहा है, 343 अत्याधुनिक हथियारों की बरामदगी और 12 करोड़ से ज्यादा की नकदी व सोना जब्त होना नक्सलियों की रीढ़ तोड़ने जैसा है.

‘पूना मारगेम’ नीति ने बंदूक छोड़ चुके युवाओं को नया जीवन दिया है, गांवों तक सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार अब तेज हो चुका है, बस्तर अब संघर्ष की पहचान से आगे बढ़कर विकास की नई इबारत लिख रहा है, सुरक्षा बलों और आम जनता की साझी जीत ने नक्सल-मुक्त बस्तर के सपने को लगभग साकार कर दिया है, अब यह इलाका स्थायी शांति और आत्मविश्वास के साथ नए युग में प्रवेश कर रहा है.

भानपुरी में युवक की हत्या का सनसनीखेज खुलासा

जगदलपुर। बस्तर जिले के भानपुरी थाना क्षेत्र से एक चौंकाने वाला हत्या का मामला सामने आया है, जहां गुमशुदगी की जांच ने एक सुनियोजित साजिश का पर्दाफाश कर दिया.

ग्राम मुंडागुड़ा निवासी लिंगाराम कश्यप के गुम होने की रिपोर्ट 27 मार्च को दर्ज की गई थी, लेकिन जांच आगे बढ़ी तो मामला हत्या तक जा पहुंचा. पुलिस की पतासाजी के दौरान सामने आया कि 24 मार्च की रात मृतक और एक अपचारी बालक के बीच पुरानी रंजिश और सिगरेट को लेकर विवाद हुआ था. यह विवाद इतना बढ़ा कि मारपीट के बाद अपचारी बालक ने रस्सी से गला घोंटकर लिंगाराम की हत्या कर दी.

हत्या के बाद आरोपियों ने साजिश के तहत सबूत मिटाने की कोशिश की. पहले शव को पास के नाले में दफनाया गया, लेकिन अगले ही दिन योजना बदलकर शव को निकालकर थाना करपावंड क्षेत्र के एक तालाब में गाड़ दिया गया, ताकि पुलिस को गुमराह किया जा सके.

भानपुरी पुलिस टीम ने गवाहों के बयान और तकनीकी जांच के आधार पर अपचारी बालक समेत तीन अन्य आरोपियों से सख्ती से पूछताछ की, जिसमें सभी ने अपराध कबूल कर लिया. मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में शव का पंचनामा तैयार किया गया और हत्या में इस्तेमाल वाहन व अन्य सामग्री भी जब्त कर ली गई है. फिलहाल पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश करने की तैयारी की जा रही है.

बस्तर में बढ़ी सुपर स्पेशियलिटी ताकत

जगदलपुर। जगदलपुर के कांटीनेंटल छत्तीसगढ़ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल ने स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में नई शुरुआत करते हुए ऑर्थोपेडिक्स विभाग की पहली सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी कर ली है, हिप जॉइंट ऑपरेशन के बाद मरीज की स्थिति में तेजी से सुधार ने यह संकेत दे दिया है कि अब बस्तर के मरीजों को बड़े शहरों की ओर भागने की जरूरत कम होगी.

डॉ. पुष्पेंद्र राठौर की अगुवाई में यह उपलब्धि अस्पताल के लिए मील का पत्थर साबित हो रही है, अस्पताल में ऑर्थो, गैस्ट्रो, यूरो और न्यूरो की नियमित ओपीडी शुरू होने से मरीजों को एक ही छत के नीचे बेहतर इलाज मिल रहा है, प्रबंधन ने रियायती दरों पर सेवाएं देने की बात भी कही है जिससे आम लोगों को राहत मिलेगी, आने वाले समय में डायलिसिस सुविधा शुरू करने की तैयारी पूरी कर ली गई है.

नेफ्रोलॉजी विशेषज्ञों की नियुक्ति से गंभीर मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी, यह पहल बस्तर में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है, अब क्षेत्र में इलाज की उपलब्धता और भरोसे दोनों में इजाफा हो रहा है, जिससे स्थानीय लोगों की निर्भरता बाहर के शहरों पर कम होगी.

पर्यटन बनाम पर्यावरण: सूखा तालाब, सड़क पर उतरे मगरमच्छ

दंतेवाड़ा। दंतेवाड़ा जिले के बारसूर स्थित ऐतिहासिक बूढ़ा तालाब को सुखाने के बाद अब इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं, दशकों से इस तालाब में रह रहे मगरमच्छ अब सड़कों और आसपास के इलाकों में दिखाई देने लगे हैं, हाल ही में बारसूर-छिंदनार मार्ग पर 10 फीट लंबा मगरमच्छ मिलने से इलाके में दहशत फैल गई.

वन विभाग ने उसे सुरक्षित पकड़कर इंद्रावती नदी में छोड़ दिया लेकिन यह घटना प्रशासनिक योजना पर सवाल खड़े कर रही है, स्थानीय लोगों का कहना है कि तालाब मगरमच्छों का प्राकृतिक आवास रहा है और यहां कभी कोई बड़ी घटना नहीं हुई, जिपलाइन परियोजना और पर्यटन के नाम पर किए गए बदलावों से वन्यजीवों का संतुलन बिगड़ रहा है.

अभी भी तालाब में तीन मगरमच्छ मौजूद हैं, और उनके सुरक्षित पुनर्वास को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है. सौंदर्यीकरण कार्य अधूरा है और जिपलाइन बंद पड़ी है, ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि विकास की कीमत क्या वन्यजीवों को चुकानी पड़ेगी, अब प्रशासन के सामने चुनौती है कि पर्यटन और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.

भृंगराज पक्षी लुप्तता की कगार पर

जगदलपुर। बस्तर के जंगलों में बांस के घटते क्षेत्र और बढ़ते शिकार ने श्यामवर्णी भृंगराज पक्षी को लुप्त होने की कगार पर ला खड़ा किया है, यह वही पक्षी है जिसकी पूंछ से गौर नृत्य के मुकुट की कलगी बनाई जाती है.

लगातार शिकार और बढ़ती मांग ने इस पक्षी की संख्या को तेजी से घटा दिया है, अब हालात यह हैं कि पारंपरिक मुकुट में भृंगराज के बजाय मुर्गे के पंख का उपयोग किया जा रहा है, एक कलगी बनाने में 40 से 80 पूंछ लगती हैं, और बाजार में इनकी कीमत भी बढ़ गई है. बस्तर के स्थानीय जंगलों में इसकी कमी के चलते अब अन्य राज्यों से पूंछ लाई जा रही है.

बांस के जंगलों की कटाई और आगजनी ने इसके प्राकृतिक आवास को भी खत्म कर दिया है, यह संकट केवल एक पक्षी का नहीं बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का है, अगर समय रहते संरक्षण के प्रयास नहीं हुए तो गौर नृत्य की असल पहचान ही बदल सकती है, यह स्थिति पर्यावरण और परंपरा दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है.

बस्तर को मिली 15 नई एम्बुलेंस

जगदलपुर। जगदलपुर में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए 15 नई एम्बुलेंस की सौगात दी गई है, महारानी अस्पताल से इन एम्बुलेंसों को विधिवत रवाना किया गया जिससे दूरस्थ क्षेत्रों तक त्वरित चिकित्सा सहायता पहुंच सकेगी, अब हर जिले में एडवांस लाइफ सपोर्ट एम्बुलेंस तैनात की जा रही हैं जिनमें वेंटिलेटर, कार्डियक मॉनिटर और डिफिब्रिलेटर जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, यह गाड़ियां चलते-फिरते आईसीयू की तरह काम करेंगी, कुल 69 एम्बुलेंस के नेटवर्क से एएलएस और बीएलएस के बीच बेहतर तालमेल बनेगा, गंभीर मरीजों को मौके पर ही प्राथमिक इलाज मिलने से गोल्डन ऑवर में जान बचाना आसान होगा, इससे निजी एम्बुलेंसों की मनमानी पर भी रोक लगेगी और ग्रामीणों को आर्थिक राहत मिलेगी, जनप्रतिनिधियों और स्वास्थ्य अधिकारियों ने इसे बस्तर के लिए जीवनदायिनी पहल बताया है, यह कदम स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव लाने की दिशा में अहम माना जा रहा है.

नक्सलवाद की समाप्ति के साथ पारद परंपरा पर उठे सवाल

चित्रकोट। बस्तर में जहां एक ओर नक्सलवाद कमजोर हुआ है, वहीं अब वन्यजीवों पर खतरा बढ़ता नजर आ रहा है, चित्रकोट क्षेत्र में पारद यानी सामूहिक शिकार की परंपरा अब बेकाबू होती दिख रही है. सैकड़ों ग्रामीणों द्वारा जंगलों में बड़े पैमाने पर शिकार किए जाने की घटनाएं सामने आई हैं.

पर्यावरणविदों का कहना है कि यह परंपरा अब वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए खतरा बन चुकी है, माटी तिहार के नाम पर होने वाला यह शिकार अब पूरे साल जारी रहने लगा है, वन विभाग की निष्क्रियता पर भी सवाल उठ रहे हैं, सामाजिक संगठनों ने इस पर प्रतिबंध और सख्त कानून की मांग की है.

उनका कहना है कि नक्सलवाद के बाद अब सरकार को वन्यजीव संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए, बस्तर की पहचान जल, जंगल और जमीन से है और यदि वन्यजीव ही खत्म हो जाएंगे तो यह संतुलन भी बिगड़ जाएगा, यह मुद्दा अब पर्यावरण बनाम परंपरा की बहस में बदलता जा रहा है.

तीन साल बाद घर वापसी, गांव में एकता का उत्सव

कोंडागांव। कोंडागांव जिले के बांगोली गांव में एक सामाजिक और भावनात्मक घटना सामने आई जहां दो परिवारों के छह सदस्य तीन साल बाद अपने मूल धर्म में लौटे, इस अवसर पर पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिला और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ उनका स्वागत किया गया, शीतला मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना और मंत्रोच्चार के बीच वापसी की प्रक्रिया पूरी कराई गई, गांव के सिरहा, गुनिया और पुजारियों ने विधिवत अनुष्ठान संपन्न कराया, इस दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीणों की मौजूदगी ने सामाजिक एकता की मिसाल पेश की, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक आयोजन के बीच यह कार्यक्रम केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक बन गया, सरपंच ने इसे गांव की संस्कृति और पहचान से जुड़ा अहम कदम बताया, इस घटना के बाद गांव में शांतिपूर्ण माहौल है और लोगों में आपसी विश्वास मजबूत हुआ है, यह घटना सामाजिक समरसता और परंपरा के प्रति जुड़ाव को दर्शाती है.

मक्का प्लांट बना विवाद का केंद्र, किसानों और पर्यावरण की दोहरी मार

कोंडागांव। कोंडागांव के कोकोड़ी गांव स्थित मक्का प्रोसेसिंग प्लांट को लेकर एक बार फिर जनहित और सियासत आमने-सामने आ गए हैं, सीपीआई ने प्लांट की समस्याओं को लेकर प्रशासन को ज्ञापन सौंपते हुए इसे सुधार के साथ दोबारा शुरू करने की मांग की है.

ग्रामीणों का आरोप है कि प्लांट से निकलने वाले दूषित पानी ने खेतों की फसलें खराब कर दी, और धुआं व राख ने पर्यावरण और स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला, किसानों को उचित कीमत और नियमित खरीदी का वादा भी पूरा नहीं हुआ. इन मुद्दों के चलते प्लांट को बंद करना पड़ा था.

पार्टी ने स्वतंत्र जांच, प्रदूषण नियंत्रण, किसानों को उचित दाम और प्रशासन-ग्रामीण संवाद की मांग रखी है, चेतावनी दी गई है कि जल्द समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन किया जाएगा, यह मामला अब विकास बनाम पर्यावरण और किसान हितों के बीच संतुलन की परीक्षा बन चुका है, प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह सभी पक्षों को साथ लेकर समाधान निकाले.