नई दिल्ली। भारतीय कला बाजार को सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के संस्थापक और उद्योगपति साइरस एस पूनावाला से एक बड़ा सहारा मिला है. राजा रवि वर्मा की पेंटिंग ‘यशोदा और कृष्ण’ के लिए उनकी ऐतिहासिक कीमत ने इसे आधुनिक भारतीय कला का अब तक का सबसे महंगा काम बना दिया है, जो सैफ़्रनआर्ट की नीलामी में 167.2 करोड़ रुपए (लगभग 18 मिलियन डॉलर) में बिकी.
यह कीमत एम.एफ. हुसैन की ‘Untitled (Gram Yatra)’ के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ देती है, जो पिछले साल दिल्ली की किरण नादर ने 118 करोड़ रुपए से ज़्यादा में खरीदी थी.
पूनावाला ने इस खरीद को एक सौभाग्य और एक ज़िम्मेदारी दोनों बताया. उन्होंने कहा, “यह राष्ट्रीय धरोहर समय-समय पर आम लोगों के देखने के लिए उपलब्ध होनी चाहिए, और इसे संभव बनाना मेरा प्रयास होगा.”
1848 में त्रावणकोर रियासत के एक कुलीन परिवार में जन्मे वर्मा, यूरोपीय तकनीक और भारतीय संवेदना के मेल के लिए सबसे ज़्यादा जाने जाते हैं. कैनवस से परे, उन्होंने 1894 में एक लिथोग्राफिक प्रेस की स्थापना की ताकि अपनी पेंटिंग्स को सस्ती प्रिंट के रूप में बड़े पैमाने पर बनाया जा सके, जिससे पहली बार हिंदू देवी-देवताओं की छवियाँ आम भारतीयों के घरों तक पहुँचीं. देवी-देवताओं की उनकी छवियाँ लोगों के मन में इतनी गहराई से बस गई हैं कि आज भी लाखों भारतीय अपने देवी-देवताओं की कल्पना उन्हीं छवियों के आधार पर करते हैं.
अनुमानित कीमत से दोगुनी कीमत पर बिकी
1890 के दशक में, जब वर्मा अपने कला-कौशल के शिखर पर थे, तब बनाई गई ‘यशोदा और कृष्ण’ पेंटिंग में शिशु कृष्ण और उनकी पालक माँ यशोदा के पौराणिक पात्रों के माध्यम से मातृ प्रेम का एक कोमल और गहरा चित्रण किया गया है. कलाकार की सबसे मशहूर कृतियों में से एक, यह पेंटिंग—जिसे साइरस एस पूनावाला ने खरीदा है—नीलामी से पहले 80 करोड़ से 120 करोड़ रुपये के बीच अनुमानित की गई थी; लेकिन इसकी अंतिम कीमत इस अनुमान से दोगुनी से भी ज़्यादा रही.
सैफ़्रनआर्ट की अध्यक्ष और सह-संस्थापक मीनल वज़ीरानी ने इसे एक निर्णायक क्षण बताया. उन्होंने कहा, “…यह न केवल कला बाज़ार के लिए एक मील का पत्थर है, बल्कि यह भारतीय कला की स्थायी सांस्कृतिक और भावनात्मक गूँज की एक सशक्त याद भी दिलाता है.”
राजा रवि वर्मा कौन थे?
1848 में त्रावणकोर के कुलीन किलिमानूर परिवार में जन्मे राजा रवि वर्मा को व्यापक रूप से शुरुआती आधुनिक भारतीय कला का अग्रदूत माना जाता है.
वर्मा ने भारत में तैल-चित्रकला (ऑयल पेंटिंग) को लोकप्रिय बनाया और वे उन पहले भारतीय कलाकारों में से थे, जिन्होंने यूरोपीय अकादमिक यथार्थवाद को भारतीय पौराणिक विषयों के साथ जोड़ा, जिससे उन्हें व्यापक पहचान मिली.
1894 में उन्होंने अपने चित्रों के किफायती प्रिंट बड़े पैमाने पर बनाने के लिए एक लिथोग्राफिक प्रेस भी स्थापित किया, जिससे हिंदू देवी-देवताओं के चित्र देश भर के घरों तक पहुँच सके.
Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m
- लल्लूराम डॉट कॉम की खबरें English में पढ़ने यहां क्लिक करें
- खेल की खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
- मनोरंजन की बड़ी खबरें पढ़ने के लिए करें क्लिक

