रेकावाया अब सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि नक्सल मुक्त व बदलते भारत की एक जीवंत तस्वीर बन चुका है, जहां सुरक्षा बलों की एंट्री एवं सुशासन एक्सप्रेस उम्मीद, विश्वास और बदलाव की रफ्तार बन गई है. हमारे संवाददाता रवि साहू रु-ब-रू करा रहे हैं बदलती तस्वीर से….

घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और अनगिनत खामोश रास्तों के बीच बसा अबूझमाड़ का रेकावाया, एक ऐसा गांव, जहां कभी पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती हुआ करता था. नारायणपुर जिला मुख्यालय से लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव तक पहुंचने के लिए न सिर्फ दुर्गम रास्तों से गुजरना पड़ता था, बल्कि दो जिलों की सीमाओं को पार कर जाना पड़ता था. यह दूरी सिर्फ भौगोलिक नहीं थी, बल्कि विकास और व्यवस्था से भी उतनी ही दूर थी.

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कभी यह इलाका नक्शे में जरूर दर्ज था, लेकिन हकीकत में यह शासन-प्रशासन की पहुंच से लगभग बाहर था. यहां सरकार का नहीं, बल्कि नक्सलियों का राज चलता था, एक ऐसा राज, जिसमें कानून की जगह बंदूक का भय और विकास की जगह विचारधारा का जाल फैला हुआ था.

रेकावाया के ग्रामीणों के लिए जीवन किसी संघर्ष से कम नहीं था. पिछले करीब पांच दशकों से वे बम, बंदूक और दहशत के साये में जीने को मजबूर थे. गांव तक न सड़क थी, न संचार, न ही कोई शासकीय सुविधा. हर रास्ता खतरे से भरा था, कहीं आईईडी, तो कहीं घात लगाकर बैठे नक्सली. यहां तक कि गांव में संचालित जनताना सरकार स्कूल में बच्चों को शिक्षा नहीं, बल्कि हथियारों की भाषा सिखाई जाती थी, जहां B for Ball की जगह B for Bomb और R for Rabbit की जगह R for Rifle पढ़ाया जाता था, वहां बचपन भी भय के साये में पनपता था.

लेकिन समय ने करवट ली केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त रणनीति, लगातार चलाए गए एंटी-नक्सल अभियानों और सुरक्षा बलों की दृढ़ता ने इस अभेद्य माने जाने वाले इलाके की तस्वीर बदलनी शुरू की.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नक्सलवाद के खात्मे के संकल्प के बाद अभियान और तेज हुए. सैकड़ों नक्सली मुठभेड़ों में ढेर हुए, हजारों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा का रास्ता चुना. अबूझमाड़ में एक के बाद एक पुलिस कैंप स्थापित हुए और सुरक्षा का दायरा मजबूत होता गया. इसी के साथ, वह दिन भी आया जब पहली बार रेकावाया तक सड़क पहुंची.

यह सड़क सिर्फ मिट्टी का ढांचा नहीं थी, बल्कि यह गांव के लिए उम्मीद और बदलाव की पहली मजबूत डोर बन गई. सड़क बनने के बाद प्रशासन ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज करानी शुरू की. नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन स्वयं रेकावाया पहुंचीं वहां, जहां कभी पंचायत का सचिव तक नहीं पहुंच पाता था.

ग्रामीणों से बातचीत में जो सच्चाई सामने आई, उसने वर्षों की उपेक्षा को उजागर कर दिया.गांव के अधिकांश लोगों के पास आधार कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र जैसे बुनियादी दस्तावेज तक नहीं थे.वे शासन की योजनाओं के हकदार होते हुए भी, कागजों में अस्तित्वहीन बने हुए थे.

यहीं से शुरू हुई एक नई पहल ,सुशासन एक्सप्रेस एक ऐसी चलती-फिरती प्रशासनिक व्यवस्था, जिसने शासन को गांव के दरवाजे तक पहुंचा दिया. दो अत्याधुनिक वाहनों से सुसज्जित इस एक्सप्रेस में वाई-फाई, कंप्यूटर, लैपटॉप, प्रिंटर, इनवर्टर और आधार कार्ड बनाने की पूरी व्यवस्था मौजूद है.

रेकावाया में जब यह एक्सप्रेस पहुंची, तो लोगों के चेहरों पर वर्षों बाद उम्मीद की चमक दिखाई दी. गांव में शिविर लगाकर लोगों के जरूरी दस्तावेज बनाए गए,अब तक जिले में 14 हजार से अधिक आवेदनों का निराकरण किया जा चुका है, और 27 प्रकार के दस्तावेज गांव में ही तैयार किए जा रहे हैं.

ग्रामीण बताते हैं कि पहले नक्सली उन्हें ऐसे दस्तावेज बनवाने से रोकते थे.लेकिन अब हालात बदल चुके हैं,लोग खुलकर सामने आ रहे हैं, अपनी पहचान बना रहे हैं और शासन की योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं. और सबसे बड़ा बदलाव शिक्षा के क्षेत्र में देखने को मिला है. जो जगह कभी नक्सलियों के जनताना सरकार स्कूल के नाम से जानी जाती थी, वो कुछ समय बाद भूमकाल छात्रावास नाम से चलने लगा और अब गांव में नया शासकीय छात्रावास भवन संचालित है. अब यहां के बच्चे बंदूक की भाषा नहीं, बल्कि किताबों की रोशनी में अपना भविष्य गढ़ रहे हैं.

नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने कहा अबूझमाड़ में नक्सल प्रभाव कम होने के बाद बेहतर स्कूल, आंगनबाड़ी,रोड कनेक्टिविटी और ग्रामीणों से साथ संवाद हो रहा है.हमने 10 स्कूल रिओपन और 24 नए स्कूल खोले हैं, जिनमे 700 से अधिक बच्चों का एडमिशन हुआ है.हमने 42 नए आंगनबाड़ी ओपन किये हैं और 1000 से अधिक बच्चों को जोड़ा है.

नेशनल हाइवे बन रहा है, जो लंका नेलांगुर महाराष्ट्र को कनेक्ट करेगा. इसके अलावा मोबाइल और इंटरनेट कनेक्टिविटी का कार्य भी सतत रूप से जारी है. उन्होंने आगे कहा कि 1 जनवरी को हमने सुशासन एक्सप्रेस का शुभारंभ किया था, उस गाड़ी में वाई-फाई,इनवर्टर इंस्टॉल है और उसमें हमारे आधार के ऑपरेटर हैं, वहां जाते हैं, साथ ही मोबाइल बैंक अकाउंट खोलने के लिए पोस्ट ऑफिस के कर्मचारी साथ जाते हैं.

गांव में दो-तीन दिनों के दौरान सुशासन एक्सप्रेस के जरिए 27 प्रकार के आवश्यक दस्तावेज बनाए जाते हैं, जिसमें आधार कार्ड,जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र,आय,जाती,निवास,किसान सम्मान प्रमाण पत्र की सुविधाएं दी जा रही है.अब तक 14592 आवेदन प्राप्त हुए हैं जिनमें 13 हजार से अधिक आवेदनों का निराकरण कर लिया गया है.

हम 3 दिवस पहले हमारी पूरी टीम रेकावाया गए हुए थे, और वहां 50 सीटर आवासीय आश्रम शाला की शुरुआत की, जिसके वहीं के बच्चे पढ़ेंगे. सबका दाखिला कर दिया गया है. मुझे उम्मीद है इससे वहां पर शिक्षा का स्तर बढ़ेगा और ग्रामीणों में जो शासन-प्रशासन के प्रति विश्वास है वह भी बढ़ेगा.

स्थानीय ग्रामीण विष्णु राम पोयाम कहते हैं पुलिस कैंप खुलने के बाद ग्रामीण काफी खुश है, गांव में ही आवश्यक दस्तावेज आधार कार्ड, राशन कार्ड, आयुष्मान कार्ड इत्यादि बन जा रहे हैं. पहले यहां से पैदल नारायणपुर या ओरछा जाते थे पहुंचने में दो-तीन दिन लग जाते थे.गांव में स्कूल बन गया है और पीडीएस गोदाम और आंगनबाड़ी भी बन रहा है.

पहले नक्सली गांव वालों को बाहर जाने नहीं देते थे, कहीं भी जाना है तो उन्हें बता कर जाना होता था, कितना दिन रहूंगा,कितने दिन बाद आऊंगा, किनसे मिलूंगा यह सब नक्सलियों को बताना पड़ता था. अब हम अपने विचार से कहीं भी घूम सकते हैं, मैं अब तक शहर नहीं देखा था इस वर्ष से मैं शहर घूमना शुरू किया हूं. अभी हमारे गांव में कलेक्टर मैडम भी आई थी. पहले पंचायत सचिव भी नहीं आता था, नक्सलियों के डर से,पहले डर था गांव आने से नक्सली पकड़ते हैं, मारपीट करते हैं, जान से भी मार देते थे, अब सभी गांव आते हैं.

वहीं जहां नक्सलियों का जनताना सरकार स्कूल संचालित था वहां मौजूद गांव के एक ग्रामीण प्रदीप ने बताया यहां पर नक्सलियों का जनताना सरकार स्कूल चलता था उसके बाद 2022 में भूमकाल स्कूल चलता था.अब यहां के बच्चों को कलेक्टर ने डूँगा व रेकावाया में स्थित शाशकीय स्कूल में शिफ्ट कर दीये. यहां पुलिस कैंप खुला तब रोड, पुलिया और स्कूल बनना शुरू हुआ और यहां के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं. प्रदीप ने बताया आसपास और भी नक्सलियों के स्कूल हुआ करते थे. अब यहां नक्सली नहीं आते हैं.

रेकावाया गांव में एक आत्मसमर्पित नक्सली पन्नालाल ओयाम ने बताया वे जनवरी 2014 से नक्सली संगठन में जुड़े थे,और जुलाई 2025 में सरेंडर किये, वे बताते हैं की बचपन में उनकी पढ़ाई जनताना सरकार भूमकाल स्कूल में हुई, वहां नक्सलियों का नाच गाना देख करके वह आकर्षित हुए, वहां गोंडी में पढ़ाई होता था और मानव विज्ञान का एक विषय रहता था.

पन्नालाल ने आगे बताया वह जिला मुख्यालय में स्थित पुनर्वास केंद्र में ट्रेनिंग ले रहे हैं और अभी छुट्टी में अपने गांव आए हैं, पहले नक्सलियों की डर से कोई लाभ नहीं ले पाते थे मुख्य धारा में लौट के बाद उनका बैंक खाता खुल गया आधार कार्ड बन गया, गांव में सड़क बन गया. पहले गांव में कुछ भी नहीं था वे लौटे तब देखा है कि गांव में स्कूल बन गया है पीडीएस गोदाम बना रहा है.