रामचरितमानस की कुछ चौपाइयाँ हमें इस बात के लिए चौकस रखती हैं कि प्रकृति, परमेश्वर और पर्व हमें अपने सूक्ष्म इशारों से कुछ ना कुछ शिक्षा देना चाहते हैं जिसे समझ कर कोई मानव अपना जीवन धन्य बना सकता हैं।
“बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सदग्रंथन गावा॥”
मानस की इस चौपाई का अर्थ है मनुष्य जन्म बहुत दुर्लभ है, इसे श्रेष्ठ कर्मों में लगाना चाहिए। और श्रेष्ठ कर्म के लिए चैतन्य जीवन बहुत आवश्यक है।

भारतीय संस्कृति में कुछ तिथियाँ जीवन के गहन सत्य और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक बन जाती हैं। ऐसा ही एक दुर्लभ और पवित्र दिन है 19 अप्रैल 2026 जब एक साथ पड़ रहे हैं अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती। यह संयोग धार्मिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना के स्तर पर भी इसकी महत्ता कम नहीं।

अक्षय तृतीया कभी न समाप्त होने के भाव को जीवंत करती है और परशुराम जयंती साहस, धर्म और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देती है। दान, सेवा और सकारात्मक कर्मों की ओर अग्रसर करने वाला यही दिन दूसरी ओर धर्म की रक्षा के लिए दृढ़ता और संकल्प का पाठ भी पढ़ाता है।

अनंत पुण्य और समृद्धि का पर्व अक्षय तृतीया

हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया को “स्वयंसिद्ध मुहूर्त” इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन किसी भी शुभ कार्य के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती। जीवन के हर शुरुआत के लिए शुभ होता है यह दिन इसमें निवेश, विवाह, व्यवसाय और आध्यात्मिक साधना सभी शामिल हैं।

“अक्षय” का अर्थ ही होता है कभी समाप्त न होना इसी आधार पर कहा जाता है कि इस दिन किए गए दान, जप, तप और सेवा का फल कई गुना बढ़ता है। हमारे भीतर की करुणा और मानवता को जागृत करने के लिए आज के दिन अन्नदान का अत्यधिक महत्व बताया गया है।

भौतिकवाद के इस युग में भी अक्षय तृतीया हमें याद दिलाती है कि सच्ची समृद्धि धन के अर्जन में नही बल्कि ज़रूरतमंदों के बीच उसके वितरण में हैं। समाज में समानता, सहयोग और सह-अस्तित्व की भावना को बढ़ाने वाला पर्व अक्षय तृतीया समाज के लिए आज अधिक हितकारी है।

धर्म और साहस का प्रतीक है परशुराम जयंती

भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम, एक परम योद्धा होने के अलावा तप और धर्म के प्रतीक भी थे । “अन्याय जब अपनी सीमा पार कर जाए तब उसे समाप्त करना भी धर्म का ही एक रूप है” यह सिखाता है भगवान परशुराम का जीवन । परशुराम का फरसा एक हथियार होने के साथ ही साथ सत्य और न्याय की स्थापना का प्रतीक भी है। साहस, आत्मबल और धर्म के प्रति अटूट आस्था का संदेश देने वाली परशुराम जयंती समाज के लिए एक ऐसी चेतना है जो ह्रास होते नैतिक मूल्यों के खिलाफ एक पुरज़ोर आवाज भी बन सकती है।

दान से समरसता और धर्म से संतुलन साधने वाला अदभुत दिन है 19 अप्रैल

‘अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती’ इन दोनों ही पर्वों का सामाजिक प्रभाव व्यापक है। अक्षय तृतीया, अन्नदान, वस्त्रदान और सेवा के माध्यम से समाज में समानता और सहानुभूति से सामाजिक समरसता बढ़ाते हुए वर्गभेद कम करता है।वहीं परशुराम जयंती, समाज में न्याय और संतुलन का पाठ पढ़ाती है। क्योंकि अन्याय के साथ समाज में शांति और विकास संभव नहीं, धर्म और न्याय का पालन समाज की स्थिरता के लिए अनिवार्य है।

इनमे से एक पर्व समाज को करुणा सिखाने वाला है और दूसरा साहस और ये दोनों मिलकर एक संतुलित और सशक्त समाज का निर्माण करने की क्षमता रखते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह दोनो दिन महत्व के हैं। उपवास, ध्यान और जप के माध्यम से अक्षय तृतीया हमारे भीतर की नकारात्मकता को समाप्त कर हमें आत्मशुद्धि का मार्ग दिखाती है। यह पर्व हमें यह समझने का अवसर देता है कि सच्चा सुख आंतरिक शांति में है।

दूसरी ओर आत्मबल और आत्मसंयम से ओतप्रोत है परशुराम जयंती, जो हमें सिखाती है कि जो व्यक्ति आत्मबल से परिपूर्ण होता है वही जीवन की कठिनाइयों का सामना कर सकता है। समग्रता से कहें तो 19 अप्रैल 2026 का यह दिन सेवा, शक्ति, करुणा, साहस, दान और धर्म का अदभुत संयोजन लेकर आया है। इन पर्वों के वास्तविक अर्थ को समझकर जब अपने जीवन में उतारते हैं तभी हम “अक्षय” सुख और शांति को सच्चे अर्थों में महसूस कर पाते हैं।

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम.