प्रमोद निर्मल, मोहला-मानपुर. मानपुर ब्लॉक के धुर नक्सल प्रभावित गांव पिट्टेमेटा के ग्रामीण इन दिनों माउंटेन मैन ‘मांझी’ के तर्ज पर पहाड़ को काटकर सड़क बनाने में जुटे हुए हैं. प्रशासनिक उदासीनता के चलते ग्रामीण अब सड़क बनाने पसीना बहा रहे. एक ओर सरकारें गांव-गांव को सड़क से जोड़कर ग्रामीण विकास के दावे कर रही है, लेकिन दूसरी ओर ग्रामीण सड़क से अनजान होकर बीहड़ों में कैद रहने को मजबूर हैं.

दरअसल ग्राम पिट्टेमेटा तक पहुंचने के लिए आज आजादी के 75 साल बाद भी सड़क नहीं बन पाई है. ऐसे में हालात व सिस्टम से मारे यहां के ग्रामीण इन दिनों खुद अपने आवागमन के लिए बीहड़ो के बीच पहाड़ी रास्ते को काटकर सड़क बनाने में जुटे हुए हैं. ग्रामीणों की मानें तो हर साल उन्हें बारिश के बाद पहाड़ी मार्ग को काट-छील कर आवागमन योग्य बनाना पड़ता है, ताकि मुख्य मार्ग से ग्राम पंचायत मुख्यालय अस्पताल, राशन समेत बाहरी दुनिया से जुड़ने के लिए मीलों दूर मुख्य सड़क तक पहुंच सकें.

कई बार लगा चुके हैं गुहार
सड़क बिना ग्रामीणों का जीवन इस कदर त्रासदी पूर्ण हो गया है कि एक ओर नदी व दूसरी ओर पहाड़ से घिरे यहां के ग्रामीण सड़क के अभाव में इलाज तक के लिए तरसने को मजबूर हैं. ग्राम पटेल दयाराम तुलावी, ग्रामीण धरम सिंह उसेंडी व अन्य ग्रामीणों के मुताबिक सड़क बनाने के लिए गांव का हर बाशिंदे यहां अपना निजी काम-धाम कर जुटते हैं. वहीं खुद पसीना बहाकर अपने लिए सड़क बनाते हैं. सड़क के लिए कई बार प्रशासन से गुहार लगा चुके हैं. पंचायत व प्रशासन से इसके लिए कोई मदद नहीं मिली. इस बात का इन आदिवासी ग्रामीणों को खासा अफसोस है.


आज तक गांव नहीं पहुंचे सीईओ : ग्रामीण
स्थानीय जनपद पंचायत के सीईओ जो लंबे समय से इस इलाके में पदस्थ हैं उनका आज तलक भी गांव तक न पहुंचना और गांव के लोगों का कभी सुध न लेना ग्रामीणों में आक्रोश का कारण बना हुआ है. ग्रामीणों के मुताबिक कई बार अर्जी प्रस्तुत करने के बाद भी सीईओ ने उनकी सुध नहीं ली. यही वजह है कि खुद सड़क बनाने को मजबूर ग्रामीणों ने अपनी दुर्दशा के लिए सीईओ की उदासीनता व स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है.

चुनाव बहिष्कार पर कायम हैं ग्रामीण
बता दें हाल ही में पिट्टेमेटा के इन ग्रामीणों द्वारा चुनाव बहिष्कार के ऐलान के बाद लल्लूराम ने खबर के जरिये इस गांव की तरफ शासन-प्रशासन का ध्यान खींचा था. इसका असर भी रहा कि कलेक्टर और एसपी को बीहड़ों में सफर कर पिट्टेमेटा गांव पहुंचना पड़ा था. इससे पहले आजादी के बाद से कोई भी स्थानीय प्रशासनिक अफसर तक इस गांव तक नहीं पहुंचे थे. कलेक्टर के पहुंचने से गांव के विकास की एक उम्मीद जरूर जगी है, लेकिन कलेक्टर, एसपी का दौरा तभी सार्थक हो पाएगा जब बीहड़ों के बीच गुमनाम हो रहा पिट्टेमेटा गांव विकास की मुख्य धारा से जुड़ पाएगा. बहरहाल ग्रामीण चुनाव बहिष्कार के ऐलान में कायम रहते हुए सुविधाओं की राह ताक रहे हैं.

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